
📰 खबर सत्यवार्ता
संवाददाता | नैनीताल/अल्मोड़ा
नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय में अल्मोड़ा जनपद की जीवनरेखा मानी जाने वाली कोसी नदी में अवैध मलवा डंपिंग, अवैध कटान और जल प्रदूषण के गंभीर आरोपों से जुड़े जनहित याचिका (PIL) मामले में सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। यह जनहित याचिका बिमोला गांव निवासी सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश चंद्र जोशी द्वारा दायर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि लंबे समय से कोसी नदी में अवैध गतिविधियां जारी हैं, लेकिन जिला प्रशासन द्वारा इस पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर मानते हुए संबंधित तथाकथित जिम्मेदार व्यक्ति को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए। इसके साथ ही न्यायालय ने अल्मोड़ा के उपजिलाधिकारी (SDM) तथा लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधिशासी अभियंता को निर्देशित किया कि वे पूरे मामले पर विस्तृत एवं तथ्यात्मक हलफनामा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें।
याचिका में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि कोसी नदी, जो अल्मोड़ा और आसपास के क्षेत्रों के लिए प्रमुख जल स्रोत है, उसमें लगातार अवैध रूप से मलवा डाला जा रहा है। इसके अलावा नदी किनारे अवैध कटान और खनन भी बड़े पैमाने पर हो रहा है, जिससे नदी की प्राकृतिक धारा प्रभावित हो रही है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन गतिविधियों के चलते न केवल पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है, बल्कि पेयजल की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है, जिससे स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य पर भी खतरा मंडरा रहा है।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि इस संबंध में जिला प्रशासन को कई बार लिखित और मौखिक शिकायतें दी गईं, लेकिन प्रशासन की ओर से या तो कोई कार्रवाई नहीं की गई या फिर औपचारिकता निभाते हुए मामले को टाल दिया गया। इसी निष्क्रियता के चलते याचिकाकर्ता को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह भी संकेत दिए कि यदि आरोपों की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्राकृतिक संसाधनों के साथ इस प्रकार की लापरवाही और अवैध गतिविधियों को किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
मामले की पैरवी कर रहे मुख्य अधिवक्ता विनोद चंद्र तिवारी ने न्यायालय के समक्ष दलील रखते हुए कहा कि कोसी नदी में अवैध मलवा डंपिंग और कटान का कार्य लंबे समय से चल रहा है, जिससे नदी का स्वरूप ही बदलता जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो भविष्य में इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। उनके साथ वरिष्ठ अधिवक्ता प्रभाकर जोशी और अधिवक्ता भूपेश सिंह भी उपस्थित रहे और उन्होंने भी मामले की गंभीरता को रेखांकित किया।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिरकार पर्यावरण संरक्षण के मामलों में स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही कितनी प्रभावी है। कोसी नदी न केवल एक जल स्रोत है, बल्कि यह क्षेत्र की जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र का भी अहम हिस्सा है। इसके प्रदूषित होने से न केवल मानव जीवन प्रभावित होगा, बल्कि वन्यजीवों और वनस्पतियों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में नदियों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यहां की पारिस्थितिकी बेहद संवेदनशील होती है। अवैध खनन, कटान और मलवा डंपिंग जैसी गतिविधियां न केवल नदी के प्रवाह को बाधित करती हैं, बल्कि भूस्खलन और बाढ़ जैसी आपदाओं का खतरा भी बढ़ाती हैं।
न्यायालय के इस सख्त रुख से यह उम्मीद जगी है कि अब प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेगा और आवश्यक कदम उठाएगा। साथ ही यह मामला अन्य क्षेत्रों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है, जहां इस प्रकार की अवैध गतिविधियां चल रही हैं लेकिन उन पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही।
अगली सुनवाई में जब प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा हलफनामा प्रस्तुत किया जाएगा, तब यह स्पष्ट हो पाएगा कि अब तक इस मामले में क्या कार्रवाई की गई है और भविष्य में क्या कदम उठाए जाएंगे। फिलहाल, न्यायालय के निर्देशों के बाद संबंधित विभागों में हलचल तेज हो गई है और सभी की निगाहें अब इस महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई पर टिकी हुई हैं।
यह मामला न केवल पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही और जनहित के प्रति संवेदनशीलता का भी एक महत्वपूर्ण परीक्षण है। अब देखना यह होगा कि न्यायालय के निर्देशों के बाद क्या वास्तव में जमीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव आता है या नहीं।



