
📰 संपादकीय
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस), भारत सरकार द्वारा ‘पृथ्वी दिवस 2026’ का आयोजन केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि वर्तमान वैश्विक पर्यावरणीय संकट के संदर्भ में एक गंभीर चेतावनी और सामूहिक आत्ममंथन का अवसर है। “हमारी शक्ति, हमारा ग्रह” विषय वस्तुतः मानव और प्रकृति के अभिन्न संबंध को रेखांकित करता है, जो आज अभूतपूर्व दबाव और असंतुलन के दौर से गुजर रहा है।
पृथ्वी भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि अब पर्यावरण संरक्षण केवल सामाजिक या वैचारिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह राष्ट्रीय और वैश्विक नीति के केंद्र में आ चुका है। सामूहिक ‘पृथ्वी दिवस संकल्प’ इस दिशा में एक सकारात्मक पहल अवश्य है, किंतु वास्तविक चुनौती इन संकल्पों को व्यवहारिक धरातल पर उतारने की है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. शैलेश नायक ने अपने विचारों के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि मानव सभ्यता ने यद्यपि अतीत में जलवायु परिवर्तनों के साथ स्वयं को अनुकूलित किया है, किंतु वर्तमान समय में परिवर्तन की गति और तीव्रता अभूतपूर्व है। विशेष रूप से पिछले सौ वर्षों में वैश्विक तापमान में हुई वृद्धि ने पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। यह स्थिति केवल वैज्ञानिक विश्लेषण का विषय नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व के लिए एक वास्तविक चुनौती बन चुकी है।
डॉ. नायक का यह कथन कि “हमें केवल यह समझने तक सीमित नहीं रहना चाहिए कि परिवर्तन कैसे हो रहे हैं, बल्कि यह भी जानना आवश्यक है कि उनके परिणाम क्या होंगे,” अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का पूर्वानुमान लगाकर उनके प्रति लचीली और न्यायसंगत नीतियां तैयार करें। यह केवल तकनीकी या वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और वैश्विक समानता का भी प्रश्न है।
कृषि क्षेत्र में संभावित परिवर्तनों का उनका विश्लेषण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सी3 और सी4 फसलों पर बढ़ते कार्बन डाइऑक्साइड के प्रभावों का अंतर यह दर्शाता है कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए हमें अपनी कृषि नीतियों में बदलाव करना होगा। “मिशन मिलेट” जैसी पहल न केवल पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करती है, बल्कि जलवायु अनुकूल कृषि की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
जल सुरक्षा का प्रश्न भी उतना ही गंभीर है। सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसे नदी बेसिनों में जल उपलब्धता के असंतुलन की संभावनाएं यह संकेत देती हैं कि आने वाले समय में जल संकट और गहरा सकता है। भारत जैसे देश, जहां जनसंख्या का बड़ा हिस्सा इन नदियों पर निर्भर है, वहां यह चुनौती और भी जटिल हो जाती है। ऐसे में जल प्रबंधन, संरक्षण और न्यायपूर्ण वितरण की नीतियों को प्राथमिकता देना अनिवार्य है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. एम. रविचंद्रन ने जिस सरलता से “पृथ्वी की गर्मी” को मानव शरीर के बुखार से जोड़ा, वह इस संकट की गंभीरता को सहज रूप में समझाने का प्रभावी प्रयास है। पृथ्वी के तापमान में कुछ डिग्री की वृद्धि भले ही नगण्य प्रतीत हो, किंतु इसके परिणाम व्यापक और विनाशकारी हो सकते हैं। महासागरों का तापमान बढ़ना, ध्रुवीय बर्फ का पिघलना और चरम मौसम घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
यह तथ्य कि मानव वर्तमान में पृथ्वी की पुनरुत्पादन क्षमता से लगभग 1.8 गुना अधिक संसाधनों का उपयोग कर रहा है, हमारे विकास मॉडल की अस्थिरता को उजागर करता है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि यदि हमने अपने उपभोग के पैटर्न और विकास की दिशा में परिवर्तन नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों का संकट और गहरा जाएगा।
भारत का यह सौभाग्य है कि उसके पास पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय जैसा एक समर्पित मंत्रालय है, जो ‘डीप ओशन मिशन’, ‘मिशन मौसम’ और ‘PRITHVI’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से इस दिशा में कार्य कर रहा है। यह पहल न केवल वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहित करती है, बल्कि नीति निर्माण के लिए ठोस आधार भी प्रदान करती है। किंतु यह भी आवश्यक है कि इन प्रयासों का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और जनसहभागिता को बढ़ावा मिले।
“हर दिन पृथ्वी दिवस है”—यह संदेश इस कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है। पर्यावरण संरक्षण को केवल एक दिवस तक सीमित रखना उसकी गंभीरता को कम कर देता है। यह एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति, संस्था और सरकार की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। जागरूकता के साथ-साथ व्यवहारिक परिवर्तन—जैसे जल और ऊर्जा की बचत, कचरा प्रबंधन, हरित जीवनशैली को अपनाना—आज की अनिवार्य आवश्यकता बन चुके हैं।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि ‘पृथ्वी दिवस 2026’ हमें केवल चेतावनी नहीं देता, बल्कि समाधान की दिशा भी दिखाता है। ज्ञान, नीति और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ही हम एक संतुलित और सुरक्षित भविष्य की ओर अग्रसर हो सकते हैं। पृथ्वी हमारी शक्ति है, और इसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य ही नहीं, बल्कि अस्तित्व का आधार भी है।



