MICU, NICU और ब्लड बैंक का जैव-चिकित्सा अपशिष्ट कथित रूप से गधेरे में फेंके जाने का आरोप • बेतलेश्वर से होकर कोसी नदी तक पहुंचने की आशंका • मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने कहा—”मामला मेरे संज्ञान में नहीं, दिखवाता हूं”
अल्मोड़ा।
अल्मोड़ा के बेस अस्पताल में जैव-चिकित्सा अपशिष्ट (बायो-मेडिकल वेस्ट) के निस्तारण को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि अस्पताल के विभिन्न संवेदनशील विभागों—जैसे MICU, NICU और ब्लड बैंक—से निकलने वाला संक्रमित चिकित्सा कचरा वैज्ञानिक तरीके से निस्तारित होने के बजाय अस्पताल के समीप स्थित गधेरे में डाला जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बरसात के दौरान यही पानी बेतलेश्वर मंदिर क्षेत्र से होते हुए कोसी नदी में मिल जाता है, जो अल्मोड़ा शहर के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोतों में से एक है। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला केवल अस्पताल की लापरवाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह जनस्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और कानून के पालन से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय बन सकता है।
इस संबंध में जब मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. चंद्र प्रकाश भैंसोड़ा से जानकारी ली गई तो उन्होंने कहा, “यह मामला मेरे संज्ञान में नहीं है, मैं इसकी जांच कराता हूं।”
जानकारी के अनुसार अस्पताल में बायो-मेडिकल वेस्ट के निस्तारण के लिए प्रतिमाह लाखों रुपये का भुगतान अधिकृत एजेंसी को किया जाता है। इसके बावजूद यदि संक्रमित कचरा खुले गधेरे या नाले में डाला जा रहा है, तो यह व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि लंबे समय पहले इस कार्य के लिए टेंडर भी हो चुका है, लेकिन धरातल पर व्यवस्थाएं संतोषजनक दिखाई नहीं देतीं।
बायो-मेडिकल वेस्ट में मरीजों के उपचार, जांच, ऑपरेशन और टीकाकरण के दौरान निकलने वाला संक्रमित एवं खतरनाक कचरा शामिल होता है। इसमें रक्त से सनी पट्टियां, शरीर के अंग, संक्रमित प्लास्टिक सामग्री, सुइयां, ब्लेड, सिरिंज, दवाइयों की शीशियां तथा अन्य संक्रामक सामग्री शामिल रहती है। ऐसे कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण न होने पर बैक्टीरिया, वायरस और अन्य रोगजनक तत्व पर्यावरण में फैल सकते हैं।
बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियम, 2016 के अनुसार अस्पतालों में जैव-चिकित्सा कचरे को चार अलग-अलग रंगों के कंटेनरों में पृथक करना अनिवार्य है। पीले डिब्बे में मानव अंग, रक्तयुक्त सामग्री और एक्सपायर्ड दवाइयां, लाल डिब्बे में संक्रमित प्लास्टिक सामग्री, सफेद कंटेनर में सुई एवं धारदार धातु सामग्री तथा नीले कंटेनर में कांच की शीशियां और एम्पुल रखे जाते हैं। इसके बाद इस कचरे को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अधिकृत कॉमन बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी (CBWTF) के माध्यम से वैज्ञानिक तरीके से नष्ट किया जाना आवश्यक है।
नियम यह भी स्पष्ट करते हैं कि जैव-चिकित्सा अपशिष्ट को 48 घंटे से अधिक अस्पताल परिसर में नहीं रखा जा सकता। यदि किसी कारणवश निर्धारित समय में उसका निस्तारण संभव न हो तो संबंधित प्राधिकरण को इसकी सूचना देना आवश्यक होता है। खुले में फेंकना या सामान्य कचरे के साथ मिलाना नियमों का गंभीर उल्लंघन माना जाता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि संक्रमित कचरा वास्तव में गधेरे के माध्यम से कोसी नदी तक पहुंच रहा है, तो इससे जल स्रोतों के दूषित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। कोसी नदी का पानी कई क्षेत्रों में पेयजल एवं अन्य उपयोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में यदि इसमें जैव-चिकित्सा अपशिष्ट का रिसाव होता है तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय हो सकता है। हालांकि, इस संबंध में प्रदूषण या जल गुणवत्ता की पुष्टि केवल सक्षम विभाग की जांच से ही हो सकती है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अस्पतालों से निकलने वाले संक्रमित कचरे के प्रबंधन में किसी भी प्रकार की लापरवाही संक्रमण फैलने, मिट्टी और जल स्रोतों के प्रदूषण तथा अस्पताल जनित संक्रमण (Hospital Acquired Infection) जैसी समस्याओं को बढ़ावा दे सकती है। इसलिए जैव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन नियमों का कड़ाई से पालन अत्यंत आवश्यक है।
अब यह मामला कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर रहा है। यदि निस्तारण के लिए नियमित भुगतान किया जा रहा है, तो संक्रमित कचरा कथित रूप से खुले क्षेत्र तक कैसे पहुंच रहा है? क्या अधिकृत एजेंसी समय पर कचरे का उठान कर रही है? क्या अस्पताल प्रशासन नियमित निगरानी कर रहा है? और यदि नियमों का उल्लंघन हो रहा है तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी?
जनस्वास्थ्य से जुड़े इस गंभीर मामले में आवश्यकता है कि जिला प्रशासन, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, स्वास्थ्य विभाग तथा मेडिकल कॉलेज प्रशासन संयुक्त रूप से स्थलीय निरीक्षण कर वस्तुस्थिति स्पष्ट करें। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई करते हुए भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।







