नामांकन के बाद अंतिम चरण में थमी चुनावी प्रक्रिया; 10 वार्डों में निर्विरोध निर्वाचन की स्थिति के बीच कुछ सीटों पर मुकाबले और पारिवारिक दावेदारी ने बढ़ाई राजनीतिक सरगर्मी
अल्मोड़ा। जिला सहकारी बैंक के चुनाव को अंतिम चरण में अचानक स्थगित किए जाने के बाद अब चर्चा केवल चुनाव टलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे बन रहे राजनीतिक समीकरणों को लेकर भी तरह-तरह के सवाल उठने लगे हैं। आधिकारिक तौर पर चुनाव स्थगित करने के पीछे आपदा को कारण बताया गया है, लेकिन नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद जिस समय निर्वाचन पर विराम लगाया गया, उसने पूरे घटनाक्रम को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
चुनावी तस्वीर पर नजर डालें तो 13 वार्डों में से 10 वार्डों में निर्विरोध निर्वाचन की स्थिति बन चुकी थी। वहीं कुछ चुनिंदा सीटों पर मुकाबला काफी दिलचस्प और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया था। विशेष समितियों की सीटों पर भाजपा महानगर अध्यक्ष विनीत बिष्ट, श्वेता पंत तथा भाजपा के एक वरिष्ठ नेता की बहू कंचन टम्टा की दावेदारी ने भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी।
धौलादेवी वार्ड में भाजपा से जुड़े दो बड़े नेताओं के आमने-सामने होने और लमगड़ा में भाजपा तथा कांग्रेस समर्थित दावेदारों के बीच संभावित मुकाबले ने चुनावी समीकरणों को और रोचक बना दिया था। ऐसे में नामांकन के बाद अचानक चुनाव स्थगित होने की टाइमिंग पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसी बीच एक और चर्चा अब धीरे-धीरे राजनीतिक गलियारों से निकलकर आम लोगों के बीच भी सुनाई देने लगी है—वह है परिवारवाद का मुद्दा। भाजपा लंबे समय से सार्वजनिक जीवन और राजनीति में परिवारवाद के विरोध को अपने प्रमुख राजनीतिक तर्कों में शामिल करती रही है। ऐसे में सहकारी चुनाव में एक वरिष्ठ भाजपा नेता की बहू की दावेदारी को लेकर कुछ लोगों के बीच यह सवाल दबे स्वर में उठ रहा है कि क्या सहकारी राजनीति में भी पारिवारिक रिश्तों की भूमिका बढ़ रही है?
हालांकि, किसी व्यक्ति की दावेदारी को केवल पारिवारिक संबंधों के आधार पर परिवारवाद कहना उचित नहीं होगा और न ही उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि चुनाव स्थगन का इससे कोई प्रत्यक्ष संबंध है। लेकिन जिस तरह एक ही चुनाव में राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवारों और नेताओं से जुड़े नाम चर्चा में आए हैं, उससे यह मुद्दा जनचर्चा का हिस्सा जरूर बन गया है।
यही वजह है कि अब पूरे घटनाक्रम में तीन अलग-अलग सवाल एक-दूसरे से जुड़ते नजर आ रहे हैं—पहला, जब प्रदेश में सहकारी चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ रही है तो अल्मोड़ा में अंतिम चरण में निर्वाचन क्यों रोका गया? दूसरा, नामांकन और नामांकन पत्रों की जांच के बीच शाम करीब 7:30 बजे स्थगन की सूचना सामने आने की टाइमिंग क्या बताती है? और तीसरा, जिन सीटों पर राजनीतिक रूप से प्रभावशाली दावेदार आमने-सामने थे, वहां बने समीकरणों का चुनाव स्थगन के बाद क्या असर पड़ेगा?
इन सवालों के जवाब फिलहाल स्पष्ट नहीं हैं। चुनाव स्थगन को किसी राजनीतिक दबाव, अंदरूनी खींचतान या परिवारवाद का परिणाम मानना अभी जल्दबाजी होगी। इसके लिए निर्वाचन संबंधी आधिकारिक आदेश, आपदा की वास्तविक परिस्थितियों और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े तथ्यों को सामने रखना जरूरी है।
फिलहाल इतना जरूर है कि सहकारी चुनाव की यह कहानी अब केवल निर्विरोध निर्वाचन और चुनावी मुकाबले तक सीमित नहीं रह गई है। आपदा के कारण स्थगन, चुनाव की टाइमिंग, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और परिवारवाद को लेकर उठ रही जनचर्चा—इन सभी पहलुओं ने अल्मोड़ा के सहकारी चुनाव को सवालों के घेरे में ला दिया है।
अब निगाहें नई निर्वाचन तिथि पर हैं। नई तारीख के साथ यह भी स्पष्ट होगा कि वर्तमान दावेदारियां और राजनीतिक समीकरण उसी रूप में कायम रहते हैं या चुनावी मैदान की तस्वीर बदलती है।



