अल्मोड़ा। अल्मोड़ा की न्यायिक अदालत ने करीब दो वर्ष तक चली चर्चित चेक बाउंस मामले की सुनवाई के बाद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी को दोषमुक्त कर दिया। न्यायिक मजिस्ट्रेट, अल्मोड़ा ने कहा कि शिकायतकर्ता अपने आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा और यह स्थापित नहीं कर सका कि विवादित चेक किसी वैध एवं विधिक रूप से वसूल किए जा सकने वाले ऋण के भुगतान के लिए जारी किया गया था।अभियुक्त के अधिवक्ता आजाद खान रहे।
मामला वर्ष 2024 में दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता तेज सिंह राठौर ने आरोप लगाया था कि पारिवारिक एवं मित्रवत संबंधों के चलते उन्होंने आरोपी सुमित मेहता को व्यवसाय के लिए 5 लाख रुपये उधार दिए थे। शिकायत के अनुसार, इस राशि के बदले आरोपी ने 2 अप्रैल 2024 को 5 लाख रुपये का चेक दिया। जब शिकायतकर्ता ने 3 अप्रैल को चेक बैंक में प्रस्तुत किया तो अगले दिन वह “पर्याप्त धनराशि न होने” (Funds Insufficient) की टिप्पणी के साथ अनादृत होकर वापस लौट आया।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने विधिक नोटिस भेजकर भुगतान की मांग की, लेकिन निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं होने पर न्यायालय में परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के तहत परिवाद दायर किया गया।
सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने अदालत में दावा किया कि आरोपी ने व्यक्तिगत रूप से उनसे ऋण लिया था और उसी ऋण के भुगतान के लिए चेक जारी किया था। दूसरी ओर आरोपी ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उसका शिकायतकर्ता से किसी प्रकार का व्यक्तिगत लेन-देन नहीं था। आरोपी का कहना था कि शिकायतकर्ता का निवेश सहारा कंपनी में था, जहां वह एजेंट के रूप में कार्य करता था। सहारा कंपनी में भुगतान अटकने के बाद शिकायतकर्ता ने कंपनी कार्यालय में रखे उसके हस्ताक्षरित चेक का दुरुपयोग करते हुए झूठा मुकदमा दर्ज कराया।
बचाव पक्ष ने अदालत के समक्ष दस्तावेज और गवाह भी प्रस्तुत किए। गवाह ने बयान दिया कि शिकायतकर्ता का सहारा कंपनी में निवेश था तथा भुगतान न मिलने के कारण वह लगातार कंपनी कार्यालय आता था। बचाव पक्ष का दावा था कि इसी दौरान कार्यालय में उपलब्ध हस्ताक्षरित चेक शिकायतकर्ता के हाथ लग गया।
न्यायालय ने पूरे मामले के साक्ष्यों, दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता ने अपने परिवाद, कानूनी नोटिस तथा शपथपत्र में यह स्पष्ट नहीं किया कि कथित 5 लाख रुपये कब दिए गए, किस माध्यम से दिए गए तथा लेन-देन की तिथि क्या थी। न्यायालय ने इसे शिकायतकर्ता के मामले की एक गंभीर कमी माना।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि यदि इतनी बड़ी राशि किसी व्यक्ति को उधार दी जाती है तो उसके संबंध में स्पष्ट विवरण, भुगतान का माध्यम तथा परिस्थितियां रिकॉर्ड पर होना अपेक्षित है। शिकायतकर्ता इन महत्वपूर्ण तथ्यों को स्थापित नहीं कर पाया।
हालांकि अदालत ने यह माना कि चेक अनादृत हुआ था तथा विधिक नोटिस समय से भेजा गया था, लेकिन धारा 138 के अंतर्गत केवल चेक का बाउंस होना ही पर्याप्त नहीं है। यह भी सिद्ध होना आवश्यक है कि चेक किसी वैध और विधिक रूप से प्रवर्तनीय ऋण या देयता के निर्वहन के लिए जारी किया गया था।
निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने कहा कि धारा 118 और 139 के अंतर्गत शिकायतकर्ता के पक्ष में प्रारंभिक विधिक अनुमान अवश्य बनता है, लेकिन यदि आरोपी संभावनाओं के आधार पर उस अनुमान को खंडित कर देता है और शिकायतकर्ता अपने दावे को ठोस साक्ष्यों से सिद्ध नहीं कर पाता, तो अभियोजन सफल नहीं माना जा सकता।
अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता के दावे में कई महत्वपूर्ण कमियां और विरोधाभास हैं। विशेष रूप से ऋण दिए जाने की तिथि, भुगतान का तरीका और लेन-देन का स्वतंत्र प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया। वहीं बचाव पक्ष द्वारा प्रस्तुत परिस्थितियों और दस्तावेजों से शिकायतकर्ता के दावे पर संदेह उत्पन्न हुआ।
इन सभी तथ्यों के आधार पर न्यायिक मजिस्ट्रेट ने कहा कि शिकायतकर्ता अपना मामला संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा है। इसलिए आरोपी को परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के आरोप से दोषमुक्त किया जाता है।
यह फैसला चेक बाउंस मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय स्पष्ट करता है कि केवल चेक के अनादृत होने से किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। शिकायतकर्ता को यह भी प्रमाणित करना होगा कि चेक वास्तव में किसी वैध ऋण या देयता के भुगतान के लिए जारी किया गया था। यदि मूल लेन-देन ही विश्वसनीय साक्ष्यों से सिद्ध नहीं होता, तो धारा 138 के तहत अभियोजन सफल नहीं हो सकता।
अल्मोड़ा न्यायालय का यह निर्णय भविष्य में आने वाले ऐसे मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है, क्योंकि इसमें न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि विधिक अनुमान के बावजूद शिकायतकर्ता को अपने दावे की विश्वसनीयता स्थापित करनी होती है। वहीं आरोपी यदि संभावनाओं के आधार पर भी शिकायतकर्ता के दावे पर उचित संदेह उत्पन्न कर देता है, तो उसे संदेह का लाभ दिया जा सकता है।
करीब दो वर्ष तक चले इस मुकदमे के बाद आए फैसले ने यह संदेश भी दिया है कि आर्थिक लेन-देन से जुड़े मामलों में लिखित दस्तावेज, भुगतान का स्पष्ट रिकॉर्ड और लेन-देन की तारीख जैसी जानकारियां अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं। इनके अभाव में न्यायालय केवल मौखिक दावों के आधार पर दोषसिद्धि नहीं कर सकता।
5 लाख रुपये के चेक बाउंस मामले में अदालत का बड़ा फैसला, आरोपी बरी
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