डीडीहाट (पिथौरागढ़)। अल्मोड़ा से प्रकाशित बाल पत्रिका बालप्रहरी तथा जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) डीडीहाट के संयुक्त तत्वावधान में “बालसाहित्य और बच्चे” विषय पर एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में शिक्षा, साहित्य और बाल मनोविज्ञान से जुड़े विभिन्न विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम में शिक्षकों, साहित्यकारों, प्रशिक्षुओं और शिक्षा विशेषज्ञों ने भाग लेते हुए बालसाहित्य की वर्तमान स्थिति और भविष्य की संभावनाओं पर अपने विचार रखे।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए डायट प्राचार्य भाष्करानंद पांडे ने कहा कि बच्चे बहुत कुछ जानते और समझते हैं, आवश्यकता केवल उन्हें अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर देने की है। उन्होंने कहा कि बालसाहित्य ऐसा होना चाहिए जिसे पढ़ने के लिए बच्चे स्वयं उत्सुक हों। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति बच्चों को “क्यों”, “कैसे” और “क्या” जैसे प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करती है, इसलिए आज के समय में वैज्ञानिक सोच और तार्किक दृष्टिकोण पर आधारित बालसाहित्य लिखे जाने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय विज्ञान और तकनीक का युग है। ऐसे में बच्चों के लिए ऐसा साहित्य तैयार किया जाना चाहिए जो मनोरंजक होने के साथ-साथ उनकी जिज्ञासा और तार्किक क्षमता को भी विकसित करे। उन्होंने शिक्षकों और साहित्यकारों से बच्चों की मानसिकता को समझते हुए रचनात्मक साहित्य तैयार करने की अपील की।
पूर्व खंड शिक्षा अधिकारी एवं प्राचार्य डी एस पांगती ने कहा कि आज बालसाहित्य काफी मात्रा में लिखा जा रहा है, लेकिन उसे बच्चों तक पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि बालसाहित्यकारों को बच्चों की सोच और भावनाओं को समझकर बच्चा बनकर लिखना होगा, तभी साहित्य बच्चों के मन तक पहुंच पाएगा।
राजकीय इंटर कॉलेज जौरासी के शिक्षक धीरज खड़ायत ने कहा कि आज के दौर में अभिभावकों और शिक्षकों दोनों को पढ़ने की संस्कृति से जुड़ना होगा। उन्होंने कहा कि मोबाइल और इंटरनेट के कारण लोग घंटों स्क्रीन पर समय बिताते हैं, लेकिन पुस्तकों के लिए समय नहीं निकालते। उन्होंने कहा कि यदि बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करनी है तो पहले बड़ों को स्वयं पुस्तक संस्कृति अपनानी होगी।
डायट के वरिष्ठ प्रवक्ता जितेंद्र मिश्रा ने कहा कि वैश्वीकरण के दौर में बच्चे हिंदी, अंग्रेजी, जापानी और अन्य विदेशी भाषाएं सीख रहे हैं, जो अच्छी बात है। लेकिन इसके साथ ही अपनी मातृभाषा को बचाए रखना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मातृभाषा बच्चों की संवेदनाओं और संस्कृति से जुड़ी होती है, इसलिए बालसाहित्य में स्थानीय भाषाओं और लोक संस्कृति को भी स्थान मिलना चाहिए।
राजकीय इंटर कॉलेज डीडीहाट के प्रधानाचार्य एवं साहित्यकार प्रेमसिंह पापड़ा ने कहा कि सोशल मीडिया और इंटरनेट के इस दौर में बालसाहित्य लेखन की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों के मनोविज्ञान को समझते हुए मनोरंजक और प्रेरणादायी साहित्य लिखा जाना चाहिए, जिससे बच्चों में सकारात्मक सोच और रचनात्मकता विकसित हो सके।
डायट प्रवक्ता राजेश कुमार पाठक ने सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि बच्चों के लिए कल्पनाशीलता के साथ-साथ यथार्थ आधारित साहित्य भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि साहित्य बच्चों को जीवन की वास्तविकताओं से परिचित कराने का भी माध्यम बन सकता है।
डायट प्रवक्ता पुनीत प्रकाश जोशी ने कहा कि वैश्वीकरण, शहरीकरण और संयुक्त परिवारों के विघटन के कारण बच्चे दादा-दादी के प्राकृतिक स्नेह से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज मोबाइल और कंप्यूटर बच्चों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं, जबकि पहले बच्चे मिट्टी और पानी के खेलों से प्रकृति के करीब रहते थे। उन्होंने चिंता जताई कि आधुनिक जीवनशैली बच्चों को प्रकृति से दूर कर रही है।
कार्यक्रम में बालप्रहरी के संपादक उदय किरौला ने बालप्रहरी और बालसाहित्य संस्थान की अवधारणा प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि 12, 13 और 14 जून 2026 को डायट डीडीहाट में बालसाहित्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जाएगी, जिसमें देशभर के लगभग 100 साहित्यकार प्रतिभाग करेंगे।
इस अवसर पर राजकीय बालिका इंटर कॉलेज डीडीहाट की जमुना मेहता, पूनम द्विवेदी, डॉ. ममता खोलिया, चंचल सिंह शाही, संजय सिंह चौहान, डॉ. एल.एस. धपोला सहित डायट के प्रशिक्षुओं ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम में बालसाहित्य को बच्चों तक पहुंचाने और पठन-पाठन संस्कृति को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया।



