अल्मोड़ा/नैनीताल। अल्मोड़ा में चर्चित ऊंट प्रकरण अब न्यायिक प्रक्रिया के नए चरण में प्रवेश कर गया है। ऊंट स्वामी शाहिद अंसारी ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय, नैनीताल में आपराधिक रिट याचिका दायर कर एफआईआर संख्या 63/2026 तथा उससे संबंधित समस्त प्रशासनिक एवं पुलिस कार्रवाई को चुनौती दी है। मामले की सुनवाई अब उच्च न्यायालय में होगी, जिस पर विधि विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों तथा आमजन की विशेष नजर बनी हुई है।
याचिका अधिवक्ता विनोद चंद्र तिवारी द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता प्रभाकर जोशी एवं वरिष्ठ अधिवक्ता भूपेश सिंह बिष्ट के सहयोग से प्रस्तुत की गई। याचिका में उत्तराखंड राज्य, सचिव (पशुपालन विभाग), जिलाधिकारी अल्मोड़ा, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अल्मोड़ा, उप जिलाधिकारी अल्मोड़ा, थानाध्यक्ष कोतवाली अल्मोड़ा, विवेचक, एनजीओ “Help in Suffering” तथा शिकायतकर्ता महिला को प्रतिवादी बनाया गया है।
याचिका में कहा गया है कि प्रशासन ने निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच पूरी किए बिना जल्दबाजी में कार्रवाई करते हुए याचिकाकर्ता के दोनों ऊंटों को अपने कब्जे में लेकर एक निजी एनजीओ को सौंप दिया। याचिकाकर्ता का दावा है कि सरकारी पशु चिकित्साधिकारी द्वारा किए गए परीक्षण में दोनों ऊंट स्वस्थ पाए गए थे, इसके बावजूद उन्हें प्रभावी सुनवाई का अवसर दिए बिना पशुओं की अभिरक्षा से वंचित कर दिया गया।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रशासनिक कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं थी। याचिकाकर्ता का कहना है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर दिए बिना उसके अधिकारों को प्रभावित करने वाली कार्रवाई संविधान एवं विधिक प्रक्रिया के विपरीत है।
याचिका में 23 जून 2026 की एक घटना का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि शिकायतकर्ता महिला ने याचिकाकर्ता से एक लिखित दस्तावेज पर हस्ताक्षर अथवा अंगूठा निशान प्राप्त किया था। याचिका में इस घटनाक्रम, उसके बाद दर्ज एफआईआर तथा प्रशासन द्वारा उठाए गए कदमों की वैधानिकता पर प्रश्न उठाए गए हैं।
याचिका के अनुसार 28 जून 2026 को शाहिद अंसारी अपने अधिवक्ता के साथ जिला प्रशासन को ज्ञापन देने पहुंचे थे, लेकिन कथित रूप से ज्ञापन स्वीकार नहीं किया गया। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया है कि इस दौरान अधिवक्ता के साथ प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा अनुचित व्यवहार किया गया।
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960 की धारा 29 का उल्लेख करते हुए कहा है कि किसी सक्षम न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि से पूर्व पशुओं की स्थायी अभिरक्षा से मालिक को वंचित किया जाना अधिनियम की मंशा के अनुरूप नहीं है। इसी आधार पर उच्च न्यायालय से एफआईआर संख्या 63/2026 को निरस्त करने, दोनों ऊंटों की अंतरिम अभिरक्षा याचिकाकर्ता को सौंपने तथा उसके विरुद्ध किसी भी प्रकार की बलपूर्वक कार्रवाई पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया है।
अधिवक्ता विनोद चंद्र तिवारी ने कहा कि यह मामला केवल दो ऊंटों तक सीमित नहीं है, बल्कि संविधान, विधि के शासन और प्रत्येक नागरिक के मौलिक एवं वैधानिक अधिकारों से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि यदि किसी प्रशासनिक प्राधिकरण द्वारा कानून की सीमाओं से परे जाकर कार्रवाई की जाती है तो न्यायपालिका ही नागरिकों के अधिकारों की अंतिम संरक्षक होती है।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि उच्च न्यायालय मामले के सभी तथ्यों एवं कानूनी पहलुओं पर विचार करते हुए न्यायसंगत निर्णय देगा तथा यदि किसी अधिकारी द्वारा अधिकारों का दुरुपयोग किया गया है तो उसके विरुद्ध भी कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित होगी।
अब इस प्रकरण की सुनवाई उत्तराखंड उच्च न्यायालय में होगी। न्यायालय के समक्ष प्रशासनिक कार्रवाई, एफआईआर की वैधानिकता, पशुओं की अभिरक्षा तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से जुड़े विभिन्न कानूनी प्रश्नों पर विचार किया जाएगा। मामले के न्यायिक परीक्षण के बाद ही अंतिम स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।







