स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को मुख्यमंत्री के आने का हवाला देकर बुलाने की चर्चा, कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत रहे मुख्य अतिथि; महिला सशक्तीकरण के मूल उद्देश्य पर उठे सवाल
अल्मोड़ा। स्थानीय उत्पादों को पहचान दिलाने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने और स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से आयोजित होने वाला सरस मेला वर्षों से अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता आया है। यह मेला केवल खरीदारी और मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि पहाड़ की महिलाओं के हुनर, मेहनत, पारंपरिक उत्पादों और स्थानीय उद्यमिता को व्यापक बाजार उपलब्ध कराने का एक महत्वपूर्ण मंच रहा है। लेकिन सरस मेला 2026 के आयोजन को लेकर अब कुछ ऐसे सवाल सामने आ रहे हैं, जिन पर सरकारी तंत्र और आयोजन से जुड़े जिम्मेदार लोगों को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
दरअसल, सरस मेले का मूल उद्देश्य स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना, उनके उत्पादों की बिक्री के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराना तथा स्थानीय और पारंपरिक उत्पादों को बाजार से जोड़ना रहा है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में, जहां स्वरोजगार और पलायन एक बड़ी चुनौती हैं, वहां इस तरह के आयोजन की उपयोगिता और भी बढ़ जाती है। पहाड़ की महिलाएं वर्षों से स्थानीय अनाज, हस्तशिल्प, पारंपरिक खाद्य पदार्थों, जैविक उत्पादों और अन्य घरेलू उत्पादों के माध्यम से अपनी आजीविका चलाने का प्रयास कर रही हैं। ऐसे में सरस मेले से उन्हें उम्मीद रहती है कि उनके उत्पादों को एक बड़ा बाजार मिलेगा और उनकी मेहनत को उचित पहचान प्राप्त होगी।
लेकिन इस बार मेले के आयोजन के दौरान स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं की सहभागिता को लेकर एक अलग ही चर्चा सामने आई है। जानकारी के अनुसार, कुछ महिलाओं को यह कहकर कार्यक्रम में आने के लिए आमंत्रित किया गया था कि मुख्यमंत्री कार्यक्रम में आने वाले हैं। हालांकि, कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत मौजूद रहे। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या महिलाओं को कार्यक्रम में बुलाने के लिए मुख्यमंत्री के आगमन का हवाला देना आवश्यक था? यदि मुख्यमंत्री का आगमन प्रस्तावित था और बाद में कार्यक्रम में बदलाव हुआ, तो क्या महिलाओं को इसकी सही जानकारी दी गई? आखिर महिलाओं को कार्यक्रम में बुलाने के पीछे वास्तविक उद्देश्य क्या था?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं किसी सरकारी आयोजन की भीड़ बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि उस आयोजन की वास्तविक हितधारक हैं। उनके श्रम, अनुभव और उत्पादों के आधार पर ही सरस मेले की सफलता का आकलन किया जाना चाहिए। यदि इन महिलाओं को कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था, तो उनकी भागीदारी को उनके उत्पादों के प्रदर्शन, विपणन और आर्थिक लाभ से जोड़ना अधिक आवश्यक था।
भीड़ से नहीं, महिलाओं की आर्थिक प्रगति से तय होनी चाहिए मेले की सफलता
किसी भी मेले की सफलता का आकलन केवल उद्घाटन समारोह में उपस्थित लोगों की संख्या या मंच पर मौजूद अतिथियों से नहीं किया जा सकता। विशेषकर सरस मेले जैसे आयोजन की सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि कितने स्थानीय उत्पादों की बिक्री हुई, कितने महिला समूहों को नए ग्राहक मिले, कितनी महिलाओं को अपने व्यवसाय के विस्तार का अवसर मिला और कितने उत्पादों को स्थायी बाजार उपलब्ध हो पाया।
यदि किसी मेले में महिला समूहों की बड़ी संख्या में उपस्थिति तो दिखाई दे, लेकिन उनके उत्पादों की बिक्री और प्रचार-प्रसार को अपेक्षित गति न मिले, तो आयोजन की मूल अवधारणा पर विचार करना स्वाभाविक है। क्या महिलाओं को अपने उत्पादों की विशेषताओं और समस्याओं को प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष रखने का अवसर मिला? क्या उनके उत्पादों की गुणवत्ता, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन को लेकर कोई ठोस पहल की गई? क्या मेले के माध्यम से उन्हें भविष्य में रोजगार और बाजार से जोड़ने की कोई कार्ययोजना तैयार हुई?
ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका जवाब आयोजन से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों को देना चाहिए।
महिला सशक्तीकरण केवल मंचीय भाषणों तक सीमित न रहे
सरकार की विभिन्न योजनाओं में महिला स्वयं सहायता समूहों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर विकसित करने पर विशेष जोर दिया जाता है। लेकिन योजनाओं की वास्तविक सफलता तभी मानी जा सकती है, जब उनका लाभ धरातल पर दिखाई दे। केवल महिलाओं को किसी कार्यक्रम में आमंत्रित कर उनकी उपस्थिति दर्ज कराना महिला सशक्तीकरण का पर्याप्त उदाहरण नहीं हो सकता।
पहाड़ की महिलाएं घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ खेती, पशुपालन, हस्तशिल्प और छोटे-छोटे व्यवसायों के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। ऐसे में उनके लिए आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में उनकी जरूरतों और अपेक्षाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्हें अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए, ताकि उनकी वास्तविक समस्याओं का समाधान हो सके।
आयोजन की जवाबदेही भी होनी चाहिए तय
सरस मेले के आयोजन में सरकारी संसाधनों, व्यवस्थाओं और विभिन्न विभागों की भागीदारी रहती है। ऐसे में यह आवश्यक है कि आयोजन के बाद उसकी उपलब्धियों और कमियों का मूल्यांकन भी किया जाए। कितने स्थानीय उत्पादकों ने भाग लिया? कितने स्वयं सहायता समूहों ने अपने स्टॉल लगाए? कितनी बिक्री हुई? कितनी महिलाओं को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ मिला? इन सवालों के आधार पर ही मेले की वास्तविक सफलता सामने आ सकती है।
कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत जैसे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी की मौजूदगी में भी यह अपेक्षा की जा सकती है कि महिला समूहों और स्थानीय उत्पादकों की समस्याओं को गंभीरता से सुना जाए। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में ऐसे आयोजनों में महिलाओं की सहभागिता केवल औपचारिकता न बने, बल्कि उन्हें वास्तविक लाभ मिले।
सरस मेला पहाड़ की संस्कृति, परंपरा, स्थानीय उत्पादों और महिला उद्यमिता को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसकी पहचान और गरिमा को बनाए रखना प्रशासन और आयोजकों दोनों की जिम्मेदारी है।
आखिरकार सवाल किसी अधिकारी या अतिथि के आने-जाने का नहीं, बल्कि उस उद्देश्य का है जिसके लिए सरस मेले की परिकल्पना की गई थी। यदि महिलाओं को मुख्यमंत्री के आगमन का हवाला देकर बुलाया गया, तो इस संबंध में स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। क्या उन्हें वास्तव में अपने उत्पादों के प्रचार और बिक्री का अवसर मिला या उनकी उपस्थिति केवल कार्यक्रम की भीड़ बढ़ाने तक सीमित रही?
सरस मेले की असली सफलता मुख्यमंत्री, आयुक्त या किसी अन्य अतिथि के स्वागत में जुटी भीड़ से नहीं, बल्कि उस महिला के चेहरे पर आने वाली मुस्कान से तय होगी, जिसके उत्पाद बिकें, जिसकी आमदनी बढ़े और जिसे अपने हुनर के दम पर आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिले। यही सरस मेले की मूल भावना है और इसी उद्देश्य को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
सरस मेला 2026 की सार्थकता पर सवाल, स्थानीय उत्पादों के प्रचार का मंच या भीड़ जुटाने का माध्यम?
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