विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस का सहकारिता चुनाव से बाहर रहना चर्चा में, भाजपा के अंदर उभरती खेमेबंदी ने बढ़ाई सियासी हलचल
अल्मोड़ा। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले हो रहे सहकारिता के चुनाव इस बार केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। सहकारी बैंक प्रतिनिधियों के चुनाव में जहां कांग्रेस की सक्रिय मौजूदगी नहीं दिख रही है, वहीं भाजपा के भीतर ही दो अलग-अलग खेमों के आमने-सामने आने की चर्चा ने सियासी माहौल को और गर्म कर दिया है।
शुक्रवार को चुनावी प्रक्रिया के दौरान स्थानीय राजनीतिक हलकों में यह चर्चा प्रमुख रही कि मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच होने के बजाय भाजपा के ही दो प्रभावशाली पक्षों के बीच दिखाई दे रहा है। इसे भाजपा नगर अध्यक्ष और केंद्रीय राज्य मंत्री एवं सांसद के परिवार से जुड़े राजनीतिक समीकरणों के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, इन राजनीतिक समीकरणों की वास्तविक स्थिति चुनाव परिणाम सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
खबर लिखे जाने तक लमगड़ा की 09 तथा विशेष समितियों की 10 सीटों पर चुनाव प्रक्रिया जारी थी। मतदान के दौरान प्रत्याशियों और उनके समर्थकों की सक्रियता बनी रही। शाम चार बजे तक मतदान प्रक्रिया पूरी होने के बाद मतगणना शुरू की जाएगी। इसके बाद आने वाले परिणाम से यह स्पष्ट होगा कि प्रतिनिधियों का समर्थन किस पक्ष के प्रत्याशियों को मिला।
कांग्रेस का बाहर रहना भी सवाल
विधानसभा चुनाव 2027 से ठीक पहले सहकारिता के चुनाव में कांग्रेस का प्रभावी तौर पर मैदान से बाहर रहना भी राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। सहकारिता क्षेत्र में होने वाले चुनावों को स्थानीय स्तर पर संगठनात्मक पकड़ और जमीनी राजनीतिक संपर्क के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में कांग्रेस की सीमित सक्रियता को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर भाजपा के भीतर दिखाई दे रही खेमेबंदी भी पार्टी के लिए चर्चा का विषय बन गई है। विधानसभा चुनाव से पहले यदि स्थानीय स्तर पर पार्टी के भीतर अलग-अलग राजनीतिक धड़े सक्रिय होते हैं तो इसका असर संगठनात्मक समीकरणों पर पड़ सकता है। हालांकि, सहकारिता चुनाव के परिणाम को सीधे विधानसभा चुनाव से जोड़ना फिलहाल जल्दबाजी होगी।
परिणाम पर टिकी नजर
सहकारिता चुनाव में सामने आए राजनीतिक समीकरणों ने आने वाले दिनों की राजनीति को लेकर भी चर्चाओं को जन्म दे दिया है। एक ओर कांग्रेस की चुनावी सक्रियता का सीमित रहना सवाल खड़े कर रहा है, तो दूसरी ओर भाजपा के भीतर सामने आती प्रतिस्पर्धा को लेकर भी पार्टी कार्यकर्ताओं की नजरें परिणाम पर टिकी हैं।
आज के चुनाव में परिणाम चाहे किसी भी प्रत्याशी या खेमे के पक्ष में आए, इतना जरूर है कि चुनाव ने भाजपा के अंदर चल रहे स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को सार्वजनिक चर्चा में ला दिया है। वहीं कांग्रेस की गैरमौजूदगी ने इस चर्चा को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
अब सभी की नजरें शाम की मतगणना पर हैं। परिणाम आने के बाद ही यह तस्वीर साफ होगी कि सहकारिता के इस चुनाव में किस पक्ष को प्रतिनिधियों का समर्थन मिला और इसका स्थानीय राजनीतिक समीकरणों पर कितना प्रभाव पड़ता है।




