जागेश्वर मंदिर समिति में सियासी दखल का पेंच, राजभवन ने लौटाई फाइल
मंदिर प्रबंधन में राजनीति की एंट्री, नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल
जागेश्वर समिति गठन में खेल, राजभवन ने लौटाई फाइल
नियमों को दरकिनार कर भर्ती की कोशिश, खुला बड़ा खेल
मंदिर प्रबंधन बना सियासी अखाड़ा, प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल
जागेश्वर समिति में सिफारिशों का खेल, प्रशासन कटघरे में
अल्मोड़ा:
प्रसिद्ध जागेश्वर मंदिर प्रबंधन समिति में प्रबंधक की नियुक्ति को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। राजनैतिक दखल और नियमों की अनदेखी के आरोपों के बीच करीब 20 माह से जिला मुख्यालय और राजभवन (लोकभवन) में अटकी फाइलों को अब वापस जिला प्रशासन को लौटा दिया गया है। राजभवन ने निर्देश दिए हैं कि प्रबंधक पद के लिए नए सिरे से आवेदन कराकर निष्पक्ष तरीके से सूची तैयार कर भेजी जाए।
गौरतलब है कि जागेश्वर मंदिर प्रबंधन समिति पिछले कई महीनों से भंग स्थिति में है, जिससे मंदिर के संचालन और प्रशासनिक कार्यों पर असर पड़ रहा है। इस समिति का गठन वर्ष 2013 में हाईकोर्ट के आदेश के तहत किया गया था। पांच सदस्यीय इस समिति के पदेन अध्यक्ष जिलाधिकारी होते हैं, जबकि प्रबंधक और उपाध्यक्ष की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
जानकारी के अनुसार, प्रबंधक का कार्यकाल अक्टूबर 2024 में समाप्त हो गया था। इससे पहले जुलाई 2024 में जिला प्रशासन ने इस पद के लिए विज्ञप्ति जारी की थी। प्रारंभिक जांच में एक ऐसे आवेदक का आवेदन निरस्त कर दिया गया, जिसका संबंध राजनीति से बताया गया। इसके बाद कथित रूप से दबाव के चलते पूरी आवेदन प्रक्रिया ही रद्द कर दी गई।
इसके बाद वर्ष 2024 में दोबारा आवेदन मांगे गए, लेकिन इस बार भी कई राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों ने आवेदन कर दिया। जबकि हाईकोर्ट की गाइडलाइन स्पष्ट रूप से कहती है कि प्रबंधक पद के लिए आवेदक का किसी भी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं होना चाहिए। सूत्रों के अनुसार, कई दावेदारों ने अपनी फाइल आगे बढ़ाने के लिए बड़े स्तर पर सिफारिशें लगाईं और अधिकारियों पर दबाव बनाने का प्रयास किया।
बताया जाता है कि जिला स्तर पर सरसरी जांच के बाद इन आवेदनों को लोकभवन भेज दिया गया। चर्चा यह भी रही कि दबाव के चलते राजनीतिक नामों को भी सूची में शामिल कर लिया गया था। हालांकि, राजभवन स्तर पर हुई जांच में यह मामला पकड़ में आ गया और कई शिकायतें भी सामने आईं। इसके बाद सभी आवेदनों की फाइलें वापस लौटा दी गईं।
राजनीतिक दखल के आरोप
सूत्रों के मुताबिक, मंदिर समिति के प्रबंधक पद—जिसकी मासिक वेतन करीब 25 हजार रुपये है—के लिए भी बड़े-बड़े राजनीतिक चेहरे मैदान में थे। हैरानी की बात यह रही कि करोड़पति दावेदार भी इस पद के लिए जोर-शोर से प्रयास कर रहे थे। अपने प्रभाव और संपर्कों के जरिए अफसरों पर दबाव बनाने की कोशिशें लंबे समय तक चलती रहीं। लोकभवन के अधिकारियों ने भी इस तरह की सिफारिशों पर आश्चर्य जताया।
उपाध्यक्ष पद पर भी असमंजस
मामला केवल प्रबंधक पद तक ही सीमित नहीं है। समिति का उपाध्यक्ष पद भी सितंबर 2024 से खाली पड़ा है। इस पद के लिए जारी विज्ञप्ति में ऐसी शर्तें रख दी गईं, जो हाईकोर्ट के आदेशों से मेल नहीं खाती थीं। उदाहरण के तौर पर, आवेदक का राजनीतिक दल से संबंध न होना और पुजारी न होना जैसी शर्तें लागू की गईं, जबकि न्यायालय के निर्देशों में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
इन सख्त और विवादित शर्तों के चलते इस पद के लिए केवल तीन ही आवेदन प्राप्त हुए, जिससे प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए। स्थानीय लोगों ने इसे प्रशासनिक लापरवाही और भ्रम की स्थिति पैदा करने वाला कदम बताया है।
नियमों का पालन अनिवार्य
नियमों के अनुसार, प्रबंधक पद के लिए कम से कम 10 आवेदन प्राप्त होना आवश्यक है। इसके साथ ही आवेदक का स्थानीय होना, सामाजिक क्षेत्र में कम से कम पांच वर्ष का अनुभव होना और किसी राजनीतिक दल से संबंध न होना जरूरी है। इन शर्तों के पूरा न होने पर फाइल को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
प्रशासन ने मानी चूक, नई प्रक्रिया शुरू
जिलाधिकारी अंशुल सिंह ने स्वीकार किया है कि आवेदन प्रक्रिया में तय गाइडलाइन का पूर्ण पालन नहीं हो पाया, जिसके चलते फाइल राजभवन से वापस लौटा दी गई। उन्होंने बताया कि अब नए सिरे से आवेदन प्रक्रिया शुरू कर दी गई है और एक माह के भीतर पूरी प्रक्रिया पूरी कर नई सूची राजभवन को भेजी जाएगी।
स्थानीय स्तर पर बढ़ी नाराजगी
जागेश्वर जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल की प्रबंधन समिति लंबे समय से भंग रहने के कारण स्थानीय लोगों में असंतोष बढ़ रहा है। लोगों का कहना है कि मंदिर जैसे आस्था के केंद्र को राजनीति से दूर रखकर पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से संचालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
अब सभी की निगाहें नई चयन प्रक्रिया पर टिकी हैं। यदि इस बार भी नियमों की अनदेखी हुई तो यह विवाद और गहरा सकता है। वहीं, यदि पारदर्शिता के साथ नियुक्ति होती है तो यह मंदिर प्रशासन के लिए एक सकारात्मक कदम साबित होगा।



