
अल्मोड़ा:
उत्तराखंड के अल्मोड़ा नगर में विकास कार्यों की हकीकत एक बार फिर सवालों के घेरे में है। नगर के प्रमुख टैक्सी स्टैंड पर लगाई गई लिफ्ट, जिस पर लगभग 52.36 लाख रुपये की भारी-भरकम लागत खर्च की गई थी, आज तक एक बार भी संचालित नहीं हो पाई है। वर्ष 2020 में बड़े ही धूमधाम से इसका लोकार्पण किया गया था, लेकिन 2026 तक यह लिफ्ट सिर्फ एक शोपीस बनकर रह गई है।
नगर पालिका परिषद, अल्मोड़ा द्वारा विधानसभा क्षेत्र अल्मोड़ा के अंतर्गत इस लिफ्ट का निर्माण आम जनता की सुविधा के लिए किया गया था। विशेष रूप से बुजुर्गों, महिलाओं और दिव्यांगजनों को ध्यान में रखते हुए इस परियोजना को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया था। लेकिन विडंबना यह है कि जिस सुविधा को लोगों की राहत के लिए बनाया गया, वह स्वयं उपेक्षा का शिकार बन गई है।
दिनांक 8 अक्टूबर 2020 को इस लिफ्ट का लोकार्पण तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के कर-कमलों द्वारा किया गया था। इस अवसर पर अजय टम्टा, तत्कालीन मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत, विधायक रघुनाथ सिंह चौहान, नगर पालिका अध्यक्ष प्रकाश चंद्र जोशी, जिला पंचायत अध्यक्षा उमा विष्ट सहित कई जनप्रतिनिधि और अधिकारी मौजूद थे। कार्यक्रम में इसे शहर के विकास की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि बताया गया था।
उल्लेखनीय है कि सांसद अजय टम्टा वर्तमान में भारत सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री के पद पर भी कार्यरत हैं। इसके बावजूद स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर गहरी नाराजगी है कि शहर के बीचों-बीच स्थित इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट की दुर्दशा की ओर उनका भी कोई ध्यान नहीं गया। जनता का आरोप है कि इतने वर्षों से लिफ्ट बंद पड़ी है, लेकिन किसी जनप्रतिनिधि ने इसकी सुध लेना जरूरी नहीं समझा।
परियोजना से जुड़े अधिकारियों में जल निगम रानीखेत के परियोजना प्रबंधक हरीश प्रकाश, अधिशासी अधिकारी श्याम सुंदर प्रसाद, मुख्य विकास अधिकारी मनुज गोयल तथा तत्कालीन जिलाधिकारी नितिन सिंह भदौरिया के नाम शिलापट्ट पर आज भी दर्ज हैं। लेकिन यह शिलापट्ट अब सवालों का प्रतीक बन चुका है, क्योंकि जिस लिफ्ट का उद्घाटन किया गया, वह आज तक चालू नहीं हो सकी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह लिफ्ट नगर के सबसे व्यस्त स्थानों में से एक टैक्सी स्टैंड पर लगाई गई थी, जहां रोजाना सैकड़ों लोग आवाजाही करते हैं। इसके बावजूद पांच वर्षों में एक बार भी इसका उपयोग नहीं हो पाया। लोगों का आरोप है कि निर्माण में तकनीकी खामियां, रखरखाव की कमी या प्रशासनिक लापरवाही के कारण यह परियोजना ठप पड़ी है।
स्थानीय नागरिकों का यह भी कहना है कि इस मामले में न तो किसी अधिकारी ने जवाबदेही तय की और न ही किसी प्रकार की जांच की गई। करोड़ों की योजनाओं के दावों के बीच यह 52.36 लाख की परियोजना जनता के पैसे की बर्बादी का उदाहरण बन गई है। लोगों में इस बात को लेकर भी नाराजगी है कि नगर के प्रमुख स्थान पर इतनी बड़ी सुविधा वर्षों से बंद पड़ी है, लेकिन जिम्मेदारों को इसकी कोई चिंता नहीं है।
नगर के वरिष्ठ नागरिकों और व्यापारियों का कहना है कि यदि यह लिफ्ट चालू हो जाती, तो विशेष रूप से बुजुर्गों और दिव्यांगजनों को काफी राहत मिलती। लेकिन वर्तमान स्थिति में यह केवल एक निष्क्रिय ढांचा बनकर रह गई है, जो प्रशासनिक उदासीनता को उजागर करता है।
इस पूरे मामले ने विकास कार्यों की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर इतने बड़े बजट की परियोजना बिना परीक्षण और संचालन के कैसे लोकार्पित कर दी गई? और यदि इसमें खामियां थीं, तो पांच वर्षों में उन्हें दूर क्यों नहीं किया गया?
अब स्थानीय जनता प्रशासन और सरकार से इस मामले में जवाबदेही तय करने की मांग कर रही है। लोगों का कहना है कि या तो इस लिफ्ट को जल्द से जल्द चालू किया जाए, या फिर इसकी विफलता के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
अल्मोड़ा टैक्सी स्टैंड की यह लिफ्ट आज एक प्रतीक बन गई है—ऐसे विकास कार्यों का, जो कागजों और उद्घाटन समारोहों तक सीमित रह जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर जनता को उनका कोई लाभ नहीं मिल पाता।



