लिंगदोह समिति की आंखें भी बंद? निर्वाचन अधिकारी से बड़ी हुई नाममात्र की समिति, थियेटर बुकिंग से सांस्कृतिक कार्यक्रम तक मचा बवाल
अल्मोड़ा। छात्रसंघ चुनाव को लेकर अल्मोड़ा में माहौल लगातार गरमाता जा रहा है। जिस चुनाव को लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली पाठशाला माना जाता है, वही चुनाव अब सवालों के घेरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। स्थिति यह है कि छात्रसंघ चुनाव की चर्चाओं और विवादों ने मानो विधानसभा चुनाव की राजनीतिक सरगर्मियों को भी पीछे छोड़ दिया है। विश्वविद्यालय परिसर से लेकर शहर की चाय की दुकानों और सोशल मीडिया तक चुनाव प्रक्रिया को लेकर तीखी चर्चाएं सुनाई दे रही हैं।
छात्रसंघ चुनावों में पारदर्शिता, समान अवसर और निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए लिंगदोह समिति की सिफारिशें लंबे समय से महत्वपूर्ण आधार मानी जाती रही हैं। इन सिफारिशों का उद्देश्य छात्र राजनीति को अनुशासित, लोकतांत्रिक और जवाबदेह बनाना था। लेकिन अल्मोड़ा में मौजूदा चुनावी परिस्थितियों को लेकर छात्रों के एक वर्ग में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इन नियमों की निगरानी कौन कर रहा है और उनकी वास्तविक जिम्मेदारी किसकी है?
इन दिनों शहर में सबसे अधिक चर्चा थियेटर में छात्र-छात्राओं को फिल्म दिखाए जाने और नगर के एक बड़े होटल के सभागार में फ्रेशर पार्टी के नाम पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम को लेकर हो रही है। चुनावी समय में आयोजित इन कार्यक्रमों को लेकर छात्र संगठनों के बीच सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इनका चुनावी प्रक्रिया से क्या संबंध है और इनके आयोजन के पीछे नियमों की स्थिति क्या है?
चर्चा तब और तेज हो गई जब सांस्कृतिक कार्यक्रम के मंच से उत्तराखंड की एक जानी-मानी लोक गायिका द्वारा कथित तौर पर वोट की अपील किए जाने की बात सामने आई। यदि किसी सांस्कृतिक मंच का इस्तेमाल चुनावी समर्थन जुटाने के लिए किया गया है तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या ऐसी गतिविधियां निर्धारित चुनावी नियमों के दायरे में आती हैं? इसका स्पष्ट जवाब निर्वाचन व्यवस्था को देना होगा।
थियेटर बुकिंग से सांस्कृतिक कार्यक्रम तक मचा बवाल
छात्रसंघ चुनावी माहौल में थियेटर बुकिंग और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लेकर उठे विवाद ने भी माहौल को और गर्म कर दिया है। कार्यक्रमों के आयोजन, संसाधनों के इस्तेमाल और चुनावी प्रक्रिया के दौरान उनकी भूमिका को लेकर छात्र संगठनों के बीच सवाल-जवाब का दौर चल रहा है।
सवाल यह है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए नियम क्या हैं? यदि किसी कार्यक्रम को लेकर आपत्ति है तो उस पर निर्णय किस आधार पर लिया जा रहा है? क्या सभी प्रत्याशियों और छात्र संगठनों के लिए एक समान व्यवस्था लागू है? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।
थियेटर बुकिंग से शुरू हुआ विवाद अब चुनावी पारदर्शिता और समान अवसर के सवाल तक पहुंच गया है। ऐसे में निर्वाचन व्यवस्था की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। केवल समिति गठित कर देना पर्याप्त नहीं, बल्कि समिति की भूमिका, अधिकार और जवाबदेही भी स्पष्ट होनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल निर्वाचन अधिकारी और चुनाव समिति की भूमिका को लेकर उठाया जा रहा है। छात्रों का कहना है कि जिस समिति को निष्पक्ष चुनाव कराने, नियमों के पालन की निगरानी करने और शिकायतों का निस्तारण करने की जिम्मेदारी दी गई है, उसकी भूमिका कई मामलों में प्रभावी नजर नहीं आ रही। यदि चुनाव संचालन करने वाली व्यवस्था ही सवालों के घेरे में आ जाए तो फिर छात्र मतदाता निष्पक्ष प्रक्रिया पर भरोसा कैसे करें?
छात्रों के बीच यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि चुनाव समिति का गठन केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए। चुनाव समिति जितनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालती है, उतनी ही स्पष्ट उसकी शक्तियां, जवाबदेही और निर्णय प्रक्रिया भी होनी चाहिए। किसी भी शिकायत पर समयबद्ध कार्रवाई और सभी प्रत्याशियों के लिए समान नियम लागू होना चुनाव की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है।
विवाद का दूसरा पहलू यह है कि छात्रसंघ चुनाव केवल पदाधिकारियों को चुनने की प्रक्रिया नहीं है। यही वह मंच है जहां से भविष्य के सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व को अनुभव मिलता है। यदि छात्र राजनीति में ही नियमों को लेकर अस्पष्टता, शिकायतों की अनदेखी और पारदर्शिता पर सवाल खड़े होने लगें तो इसका असर व्यापक लोकतांत्रिक संस्कृति पर भी पड़ सकता है।
छात्रों का कहना है कि चुनाव किसी व्यक्ति, संगठन या गुट का नहीं, बल्कि पूरे छात्र समुदाय का अधिकार है। इसलिए निर्वाचन प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की पक्षधरता की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। हर प्रत्याशी को समान अवसर, हर मतदाता को स्वतंत्र मतदान का अधिकार और हर शिकायत पर निष्पक्ष सुनवाई मिलना आवश्यक है।
अब निगाहें विश्वविद्यालय प्रशासन और निर्वाचन व्यवस्था पर टिकी हैं। सवाल सीधा है—क्या चुनाव प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब मिलेगा? क्या लिंगदोह समिति की सिफारिशों का वास्तविक अनुपालन सुनिश्चित किया जाएगा? और क्या चुनाव समिति अपनी भूमिका को केवल नाममात्र की व्यवस्था से आगे बढ़ाकर प्रभावी निगरानी तंत्र के रूप में स्थापित करेगी?
छात्रसंघ चुनाव की निष्पक्षता केवल एक चुनाव का सवाल नहीं, बल्कि परिसर में लोकतांत्रिक मूल्यों की विश्वसनीयता का सवाल है। यदि व्यवस्था पारदर्शी है तो सवालों के जवाब भी पारदर्शी होने चाहिए। अब छात्रों को आश्वासन नहीं, बल्कि नियमों के स्पष्ट और समान अनुपालन की अपेक्षा है।




