धामी सरकार का शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता पर जोर; अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के दायरे में आएंगे विभिन्न समुदायों के शिक्षण संस्थान
देहरादून। उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार ने मदरसा शिक्षा को राज्य की निर्धारित शैक्षिक व्यवस्था के अनुरूप लाने की दिशा में कदम उठाए हैं। इसी क्रम में मान्यता प्राप्त मदरसों में शुक्रवार के स्थान पर रविवार को साप्ताहिक अवकाश रखने का निर्देश जारी किया गया है। इसके साथ ही मदरसों की मान्यता, पाठ्यक्रम और शैक्षणिक मानकों को लेकर नई व्यवस्था लागू की गई है।
राज्य सरकार की नई व्यवस्था के तहत उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड की जगह उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण को जिम्मेदारी दी गई है। यह प्राधिकरण केवल मदरसों तक सीमित नहीं है, बल्कि मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों के शिक्षण संस्थानों को नियामक व्यवस्था के अंतर्गत लाने के लिए बनाया गया है।
सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों को आधुनिक, गुणवत्तापूर्ण और व्यापक शिक्षा उपलब्ध कराना है, ताकि वे मुख्यधारा की शिक्षा से जुड़कर भविष्य में बेहतर अवसर प्राप्त कर सकें।
शुक्रवार के स्थान पर रविवार को अवकाश
21 अक्टूबर 2026 को सामने आई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के निर्देश के बाद शिक्षा विभाग से मान्यता प्राप्त मदरसों में शुक्रवार के बजाय रविवार को साप्ताहिक अवकाश रखने की व्यवस्था की गई है। यह निर्देश उन मदरसों पर भी लागू होगा जो मान्यता के लिए आवेदन कर चुके हैं और निर्धारित प्रक्रिया के अंतर्गत हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने समान शैक्षिक व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थानों को शिक्षा विभाग के नियमों का पालन करना चाहिए। सरकार का तर्क है कि जब ये संस्थान विद्यालय के रूप में मान्यता प्राप्त हैं, तो उन्हें राज्य की निर्धारित शैक्षिक व्यवस्था के अनुरूप काम करना होगा।
इस फैसले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। जहां सरकार इसे शिक्षा व्यवस्था में समानता और एकरूपता की दिशा में कदम बता रही है, वहीं विपक्ष ने इसे लेकर सवाल उठाए हैं। ऐसे में इस निर्णय का वास्तविक प्रभाव संस्थानों, विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों पर किस तरह पड़ेगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
मदरसा बोर्ड की जगह नया प्राधिकरण
उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2025 में पारित कानून के माध्यम से मदरसा बोर्ड की पुरानी व्यवस्था समाप्त कर अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए एक नई नियामक प्रणाली तैयार की। जुलाई 2026 से नई व्यवस्था लागू होने के बाद राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण को मान्यता और शैक्षणिक मानकों से संबंधित महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गईं।
प्राधिकरण का नेतृत्व प्रोफेसर सुरजीत सिंह गांधी कर रहे हैं। इसमें शिक्षा और विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। प्राधिकरण का उद्देश्य अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जिसमें आधुनिक शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण पाठ्यक्रम और निर्धारित शैक्षणिक मानकों को प्राथमिकता मिले।
नई प्रणाली के अंतर्गत संबंधित संस्थानों को उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा बोर्ड से संबद्धता और प्राधिकरण से मान्यता की निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होगी। संस्थानों को मान्यता देने के लिए दस्तावेजों, भूमि, वित्तीय स्थिति, कर्मचारियों की योग्यता और नियमों के अनुपालन जैसे पहलुओं की जांच की जा सकती है।
धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम पर भी ध्यान
मदरसों में आधुनिक विषयों के साथ धार्मिक शिक्षा की भूमिका को लेकर भी नई व्यवस्था में चर्चा हुई है। प्राधिकरण के अध्यक्ष प्रोफेसर सुरजीत सिंह गांधी के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम तैयार करने का काम किया गया है। सरकार का जोर इस बात पर है कि धार्मिक शिक्षा के साथ विद्यार्थियों में सामाजिक सद्भाव, आपसी सम्मान और नागरिक जिम्मेदारी की भावना भी विकसित हो।
इस विषय पर यह अंतर समझना जरूरी है कि धार्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम निर्धारित करना और किसी पूरे धार्मिक समुदाय या परंपरा को नफरत अथवा हिंसा से जोड़ना दो अलग बातें हैं। किसी विशेष पाठ्यक्रम के बारे में गंभीर आरोपों का आकलन उसके वास्तविक पाठ्यक्रम, शिक्षण सामग्री और प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए।
इसलिए देवबंदी या किसी अन्य धार्मिक परंपरा के पाठ्यक्रम को लेकर लगाए गए व्यापक आरोपों को स्वतंत्र प्रमाण के बिना स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। डॉ. आरिफ मोहम्मद खान के नाम से प्रसारित कथनों के संबंध में भी मूल साक्षात्कार और संदर्भ की पुष्टि आवश्यक है।
शिक्षा व्यवस्था में बदलाव का उद्देश्य
राज्य सरकार की ओर से नई व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य यह बताया गया है कि अल्पसंख्यक समुदायों के विद्यार्थियों को हिंदी, गणित, विज्ञान, अंग्रेजी और अन्य आधुनिक विषयों की व्यवस्थित शिक्षा मिले। इससे विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, तकनीकी प्रशिक्षण और रोजगार के अवसरों तक पहुंच बनाने में सहायता मिल सकती है।
हालांकि, शिक्षा व्यवस्था में किसी भी बड़े बदलाव की सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। पर्याप्त शिक्षक, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण सामग्री, नियमित निरीक्षण और विद्यार्थियों के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
मान्यता प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना भी जरूरी है, ताकि नियमों का पालन करने वाले संस्थानों को अनावश्यक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े और अनियमितता पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई की जा सके।
आगे क्या होगा?
उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा की पुरानी व्यवस्था से नई नियामक प्रणाली की ओर बदलाव जारी है। शुक्रवार के स्थान पर रविवार को अवकाश, विद्यालयी शिक्षा बोर्ड से संबद्धता और अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की मान्यता जैसी व्यवस्थाएं इस बदलाव के प्रमुख हिस्से हैं।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नया पाठ्यक्रम किस प्रकार लागू किया जाता है, संस्थानों की मान्यता प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रहती है और विद्यार्थियों को आधुनिक तथा धार्मिक शिक्षा के बीच संतुलित अवसर कैसे मिलते हैं।
सरकार के सामने चुनौती केवल नियम लागू करने की नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करने की भी है जो विद्यार्थियों के ज्ञान, कौशल, सामाजिक सद्भाव और भविष्य की संभावनाओं को मजबूत करे।
उत्तराखंड में मदरसों की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव: रविवार को छुट्टी, धार्मिक पाठ्यक्रम के लिए भी तय होंगे मानक
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