अल्मोड़ा के रैमजे कॉलेज से पढ़े दीक्षांत कार्की ने सात समंदर पार बनाई पहचान, प्रतिष्ठित ‘रूह’ में संभाली मिष्ठान्न एवं पेस्ट्री प्रमुख की जिम्मेदारी
अल्मोड़ा। मंजिल सैन फ्रांसिस्को हो और सफर की शुरुआत अल्मोड़ा की पहाड़ियों से हुई हो, तो सफलता की कहानी अपने आप में खास बन जाती है। अल्मोड़ा से जुड़े युवा दीक्षांत कार्की ने अपनी मेहनत, लगन और पाक-कला के हुनर से अंतरराष्ट्रीय आतिथ्य जगत में अपनी अलग पहचान बनाई है। आज वह अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को स्थित प्रतिष्ठित भारतीय रेस्तरां ‘रूह’ में मिष्ठान्न एवं पेस्ट्री प्रमुख के रूप में अपनी रचनात्मक पाक-कला का स्वाद दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।
दीक्षांत की सफलता केवल किसी बड़े प्रतिष्ठान में महत्वपूर्ण पद हासिल करने की कहानी नहीं है। यह उस लंबे संघर्ष और अनुभव की कहानी है, जिसमें अल्मोड़ा की शिक्षा से लेकर भारत के नामी होटलों, संयुक्त अरब अमीरात, बैंकॉक, समुद्री पर्यटन जहाजों, नई दिल्ली, न्यू जर्सी और अब सैन फ्रांसिस्को तक का सफर शामिल है।
अल्मोड़ा की धरती से जुड़ी हैं सफलता की जड़ें
दीक्षांत कार्की ने अपनी बारहवीं तक की शिक्षा रैमजे कॉलेज, अल्मोड़ा से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने होटल प्रबंधन की पढ़ाई कर पाक-कला और आतिथ्य को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया।
मिष्ठान्न एवं पेस्ट्री निर्माण देखने में जितना आकर्षक दिखाई देता है, वास्तव में वह उतना ही कठिन और तकनीकी कार्य है। सामग्री की सही मात्रा, तापमान का सटीक संतुलन, स्वाद और बनावट का मेल तथा व्यंजन को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करने की कला—इन सभी में महारत हासिल करने के लिए वर्षों का अभ्यास आवश्यक होता है।
दीक्षांत ने इसी कठिन विधा को अपनी पहचान बनाया।
ओबेरॉय जैसे प्रतिष्ठित समूह में मिला अनुभव
अपने व्यावसायिक जीवन में दीक्षांत को देश के कई प्रतिष्ठित होटल समूहों के साथ कार्य करने का अवसर मिला। जयपुर के ट्राइडेंट होटल में औद्योगिक प्रशिक्षण से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे बड़े संस्थानों तक पहुंचा।
उन्होंने आगरा के विश्व प्रसिद्ध द ओबेरॉय अमरविलास और द ओबेरॉय गुड़गांव में कार्य करते हुए उच्चस्तरीय आतिथ्य और पाक-कला की बारीकियों को समझा।
संयुक्त अरब अमीरात स्थित द ओबेरॉय अल जोराह के विशेष कार्यदल का हिस्सा बनना भी उनके व्यावसायिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। यहां उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर की सेवा व्यवस्था और भोजन निर्माण प्रणाली को निकट से समझने का अवसर मिला।

समुद्र के बीच भी चलता रहा स्वाद का सफर
दीक्षांत के हुनर की यात्रा यहीं नहीं रुकी। वह बैंकॉक पहुंचे और वहां अंतरराष्ट्रीय आतिथ्य क्षेत्र में काम किया। इसके बाद उन्होंने समुद्री पर्यटन उद्योग में कदम रखा।
कार्निवल क्रूज लाइन्स में पेस्ट्री शेफ और बाद में एमएससी क्रूज यॉट क्लब के साथ काम करते हुए उन्हें दुनिया के अलग-अलग देशों के यात्रियों के लिए मिष्ठान्न तैयार करने का अवसर मिला।
समुद्र के बीच चलते विशाल जहाज पर हजारों यात्रियों के लिए एक समान गुणवत्ता बनाए रखना और अलग-अलग संस्कृतियों के लोगों की पसंद के अनुसार व्यंजन तैयार करना उनके लिए एक नया अनुभव था। इस अनुभव ने उनके हुनर को वैश्विक दृष्टि प्रदान की।
अमेरिका पहुंचा अल्मोड़ा से निकला हुनर
नई दिल्ली के प्रतिष्ठित ऑलिव बार एंड किचन में कार्य करने के बाद दीक्षांत की व्यावसायिक यात्रा अमेरिका पहुंची। न्यू जर्सी में उन्होंने पेस्ट्री उप-प्रमुख शेफ के रूप में काम किया।
और अब उनकी यात्रा सैन फ्रांसिस्को के प्रतिष्ठित ‘रूह’ तक पहुंच गई है।
यहां वह मिष्ठान्न एवं पेस्ट्री रसोई का नेतृत्व करते हुए भारतीय स्वाद को आधुनिक वैश्विक तकनीकों के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं।
मिठाई नहीं, थाली की अंतिम कहानी तैयार करते हैं दीक्षांत
दीक्षांत के काम की खासियत यह है कि उनके लिए मिष्ठान्न केवल भोजन के अंत में परोसा जाने वाला मीठा व्यंजन नहीं है। वह इसे पूरे भोजन अनुभव की अंतिम कहानी के रूप में देखते हैं।
उनकी पाक शैली में पारंपरिक यूरोपीय पेस्ट्री निर्माण तकनीक की सटीकता है, तो भारतीय मसालों, स्वाद और सुगंध की पहचान भी। आधुनिक प्रस्तुति के माध्यम से वह दोनों पाक संस्कृतियों को एक ही थाली में जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
यही प्रयोगशीलता उन्हें एक अलग पहचान देती है।
पहाड़ के युवाओं के लिए खुलती संभावनाओं की नई राह
दीक्षांत कार्की की कहानी उत्तराखंड के युवाओं के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि सफलता का रास्ता केवल परंपरागत नौकरियों से होकर नहीं गुजरता।
होटल प्रबंधन, पाक-कला, बेकरी, मिष्ठान्न निर्माण और आतिथ्य जैसे क्षेत्र भी युवाओं को दुनिया के बड़े मंच तक पहुंचा सकते हैं। आवश्यकता है तो अपने हुनर को पहचानने, उसका विधिवत प्रशिक्षण लेने और लगातार आगे बढ़ते रहने की।
रैमजे कॉलेज, अल्मोड़ा से पढ़ाई करने वाले दीक्षांत का सैन फ्रांसिस्को तक पहुंचना इस बात का उदाहरण है कि छोटे शहर से निकलने वाला युवा भी अपनी मेहनत के बल पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थान बना सकता है।
अल्मोड़ा की पहाड़ियों से शुरू हुआ यह सफर आज सैन फ्रांसिस्को की प्रतिष्ठित रसोई तक पहुंच गया है। दीक्षांत कार्की आज अपनी पाक-कला से केवल मिठास नहीं परोस रहे, बल्कि सात समंदर पार पहाड़ की प्रतिभा की एक खूबसूरत कहानी भी लिख रहे हैं।




