अल्मोड़ा। करीब चार वर्षों तक चले बहुचर्चित पॉक्सो (POCSO) मामले में अल्मोड़ा की विशेष न्यायालय (पॉक्सो) ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते, बल्कि उन्हें ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से प्रमाणित किया जाना आवश्यक है।
मामला वर्ष 2022 का है, जब पीड़िता के पिता ने सोमेश्वर थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि अज्ञात मोबाइल नंबरों से उनकी नाबालिग पुत्री को लगातार फोन किए जा रहे थे। उसे अश्लील संदेश भेजे गए, फोटो मांगकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया तथा जान से मारने की धमकी भी दी गई। शिकायत के आधार पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं और पॉक्सो अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की।
जांच के दौरान पुलिस ने कई मोबाइल फोन, सिम कार्ड और अन्य डिजिटल उपकरण जब्त किए तथा फॉरेंसिक जांच भी कराई। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि आरोपी ने विभिन्न मोबाइल नंबरों से पीड़िता को फोन, व्हाट्सएप संदेश और आपत्तिजनक सामग्री भेजी थी। वहीं बचाव पक्ष ने आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा कि संबंधित मोबाइल नंबर आरोपी के नहीं थे और उसे झूठा फंसाया गया है।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह प्रमाणित नहीं कर सका कि जिन मोबाइल नंबरों से कथित रूप से कॉल और संदेश भेजे गए, उनका वास्तविक उपयोगकर्ता आरोपी ही था। कॉल डिटेल रिकॉर्ड, मोबाइल कंपनियों के अधिकृत अभिलेख तथा अन्य आवश्यक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य न्यायालय के समक्ष पर्याप्त रूप से प्रस्तुत नहीं किए गए। साथ ही गवाहों के बयानों में भी कई महत्वपूर्ण विरोधाभास पाए गए, जिससे अभियोजन की कहानी कमजोर हुई।
न्यायालय ने यह भी माना कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी, किंतु केवल इस तथ्य से आरोपी का अपराध सिद्ध नहीं हो जाता। अपराध सिद्ध करने के लिए आरोपी और कथित मोबाइल नंबरों के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित करना आवश्यक था, जो अभियोजन पक्ष नहीं कर पाया। न्यायालय ने कहा कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि तभी संभव है जब आरोप संदेह से परे प्रमाणित हों।
इन सभी तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के परीक्षण के बाद विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो) श्रीकांत पाण्डेय ने आरोपी को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर बरी करने का आदेश पारित किया। यह निर्णय 3 अगस्त 2026 को सुनाया गया, जबकि यह मामला 4 जुलाई 2022 से न्यायालय में विचाराधीन था।
इस मामले में अभियुक्त जगदीश चन्द्र उर्फ जय कुमार, निवासी ग्राम खिसरें, गनियाधोली, तहसील रानीखेत, जनपद अल्मोड़ा के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 354-डी(1), 504 एवं 506 तथा पॉक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 11(II)(IV) सहपठित धारा 12 के तहत आरोप तय किए गए थे। मामले की सुनवाई के बाद विशेष न्यायालय ने साक्ष्यों के अभाव में आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।
वहीं अभियुक्त की ओर से विद्वान अधिवक्ता दीप चन्द्र जोशी और रितेश कुमार ने प्रभावी पैरवी करते हुए अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों और इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणों में मौजूद कमियों को न्यायालय के समक्ष रखा, जिसके आधार पर न्यायालय ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।
नाबालिग से अश्लील चैट और धमकी के मामले में आरोपी बरी, साक्ष्यों के अभाव में विशेष न्यायालय का फैसला
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