आयुक्त ने खोलने के दिए निर्देश, मेयर बोले—“सुरक्षा से समझौता नहीं”; पार्षदों का पलटवार—“क्या व्यवस्था एक विशेष वर्ग के लिए?”
बड़ा सवाल : एक ही निगम में दो फैसले क्यों?
नियमानुसार गेट खोलने का आयुक्त का निर्देश और महापौर का गेट न हटाने का ऐलान आमने-सामने
अल्मोड़ा। 52 सीढ़ी मार्ग पर लगाए गए गेट को लेकर नगर निगम की राजनीति अब सीधे टकराव की स्थिति में पहुंच गई है। पार्षदों की चेतावनी के बाद नगर निगम आयुक्त की ओर से नियमानुसार गेट खोलने के निर्देश दिए जाने की बात सामने आई, लेकिन कुछ ही समय बाद महापौर अजय वर्मा ने सुरक्षा का हवाला देते हुए गेट हटाने से इनकार कर दिया।
एक ओर प्रशासनिक स्तर पर मार्ग खोलने के निर्देश और दूसरी ओर महापौर का इसे हटाने से इनकार—नगर निगम की निर्णय प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर रहा है। अब मामला केवल एक गेट का नहीं, बल्कि अधिकार, जवाबदेही, जनसुविधा और समान व्यवस्था का बन गया है।
मेयर का तर्क—बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च
महापौर अजय वर्मा का कहना है कि 52 सीढ़ी मार्ग के आसपास कई विद्यालय हैं और प्रतिदिन बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे इस रास्ते से गुजरते हैं। मार्ग संकरा होने के कारण दोपहिया वाहनों की आवाजाही से दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।
महापौर के अनुसार स्थानीय नागरिकों और महिलाओं की मांग पर बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए गेट लगाया गया। उनका कहना है कि सुरक्षा के मामले में नगर निगम किसी दबाव में नहीं आएगा और वर्तमान परिस्थितियों में गेट हटाने का सवाल ही नहीं है।
मेयर का सवाल—दुर्घटना हुई तो जिम्मेदारी कौन लेगा?
महापौर ने मार्ग खोलने की मांग कर रहे जनप्रतिनिधियों से लिखित जिम्मेदारी लेने को कहा है। उनका तर्क है कि यदि मार्ग खोलने के बाद कोई दुर्घटना होती है तो संबंधित जनप्रतिनिधि दुर्घटना और उपचार की जिम्मेदारी लें।
यहीं से विवाद और तीखा हो गया।
पार्षदों का पलटवार—“जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाने से पहले निगम अपना काम देखे”
पार्षद दीपक कुमार, विकास कुमार, नवीन आर्या, अंजू बिष्ट सहित अन्य पार्षदों ने महापौर के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी।
पार्षदों का कहना है कि यदि दुर्घटना की जिम्मेदारी मार्ग खोलने की मांग करने वाले जनप्रतिनिधियों से मांगी जा रही है तो नगर के टूटे रास्तों, खुले नालों, गड्ढों और बदहाल पैदल मार्गों की जिम्मेदारी कौन लेगा?
उनका कहना है कि शहर के अनेक हिस्सों में नागरिक रोज जोखिम उठाकर चल रहे हैं। ऐसे में केवल 52 सीढ़ी के मामले में जिम्मेदारी तय करने की बात करना सवाल खड़े करता है।
पार्षदों का दो टूक कहना है—“जनप्रतिनिधियों को जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाने से पहले महापौर पूरे नगर की जिम्मेदारी लें।”
सबसे बड़ा आरोप : “क्या यह व्यवस्था एक विशेष वर्ग के लिए?”
विवाद के बीच पार्षदों ने नगर निगम की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा किया है। उनका आरोप है कि कहीं गेट लगाने की पूरी कवायद एक विशेष वर्ग के लोगों को सुविधा देने के उद्देश्य से तो नहीं की जा रही?
पार्षदों ने कहा कि वे किसी वर्ग या व्यक्ति के विरोध में नहीं हैं। उनका सवाल केवल व्यवस्था की समानता को लेकर है।
उनका कहना है कि यदि बच्चों और नागरिकों की सुरक्षा वास्तव में उद्देश्य है तो व्यवस्था सभी के लिए समान होनी चाहिए। किसी एक वर्ग अथवा कुछ लोगों की सुविधा के लिए सार्वजनिक मार्ग की व्यवस्था में बदलाव करना उचित नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट किया—
“हम बच्चों की सुरक्षा के खिलाफ नहीं हैं। हम किसी विशेष वर्ग के खिलाफ भी नहीं हैं। हम सिर्फ यह पूछ रहे हैं कि सार्वजनिक व्यवस्था सभी के लिए समान क्यों नहीं हो सकती?”
अगर सुरक्षा ही मुद्दा है तो दोनों तरफ गेट क्यों नहीं?
पार्षदों ने नगर निगम के सुरक्षा तर्क पर भी सवाल उठाया है।
उनका कहना है कि यदि दोपहिया वाहनों की आवाजाही बच्चों के लिए खतरा है तो मार्ग को दोनों ओर से पूरी तरह बंद किया जाना चाहिए। केवल एक हिस्से में गेट लगाने और दूसरी ओर से आवाजाही जारी रखने से सुरक्षा का उद्देश्य किस तरह पूरा होगा, यह निगम को स्पष्ट करना चाहिए।
सवाल सीधा है—सुरक्षा आधे रास्ते में लागू होगी या पूरे मार्ग पर?
“क्या हमारे क्षेत्र के लोगों की जिम्मेदारी महापौर की नहीं?”
महापौर द्वारा जनप्रतिनिधियों से व्यक्तिगत जिम्मेदारी मांगने पर पार्षदों ने कड़ा सवाल किया है।
उन्होंने कहा कि यदि उनके क्षेत्र के लोग चुने हुए पार्षदों से अपनी समस्या रखते हैं तो उसे नगर निगम के सामने रखना उनका दायित्व है।
पार्षदों ने सवाल किया—
“क्या हमारे क्षेत्र के लोगों की जिम्मेदारी महापौर की नहीं है?”
उनका कहना है कि जनप्रतिनिधि जनता की आवाज उठाते हैं। हर मांग को राजनीतिक विरोध बताना लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।
बड़ा सवाल
आयुक्त का आदेश या मेयर का फैसला—निगम में चलेगा किसका?
- आयुक्त ने नियमानुसार गेट खोलने के निर्देश दिए तो क्या उस पर अमल होगा?
- महापौर के गेट न हटाने के बयान के बाद आयुक्त का आदेश किस स्थिति में है?
- क्या नगर निगम में प्रशासनिक निर्णय और राजनीतिक निर्णय अलग-अलग दिशा में चल रहे हैं?
- यदि सुरक्षा आधार है तो दोनों तरफ से मार्ग बंद क्यों नहीं?
- स्थानीय नागरिकों के लिए वैकल्पिक सुरक्षित मार्ग की व्यवस्था क्यों नहीं?
- यदि दुर्घटना की जिम्मेदारी जनप्रतिनिधियों की होगी तो निगम क्षेत्र के जर्जर रास्तों और खुले नालों की जिम्मेदारी किसकी होगी?
- क्या सार्वजनिक मार्ग की व्यवस्था सभी नागरिकों के लिए समान है?
- पार्षदों के विशेष वर्ग संबंधी आरोप पर नगर निगम की सफाई क्या है?
गेट से आगे बढ़ गया विवाद
52 सीढ़ी का गेट अब केवल रास्ता खोलने और बंद करने का मामला नहीं रह गया है। यह विवाद नगर निगम की कार्यशैली, प्रशासनिक अधिकार, जनप्रतिनिधियों की भूमिका और जवाबदेही का मुद्दा बन गया है।
महापौर सुरक्षा को आधार बनाकर गेट बनाए रखने पर अड़े हैं, जबकि पार्षद इसे जनसुविधा और समान व्यवस्था से जोड़ रहे हैं।
पार्षदों का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर ऐसी व्यवस्था स्वीकार नहीं की जा सकती जिसमें आम नागरिकों की सुविधा प्रभावित हो और सवाल उठाने वाले जनप्रतिनिधियों को ही जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की जाए।
उनका कहना है कि यदि मार्ग संवेदनशील है तो नगर निगम को तकनीकी सर्वे कराना चाहिए, यातायात की वास्तविक स्थिति सामने रखनी चाहिए और सुरक्षित विकल्प उपलब्ध कराना चाहिए।
अब जनता जवाब चाहती है
52 सीढ़ी मार्ग का विवाद अब नगर निगम के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है। एक तरफ आयुक्त का कथित निर्देश, दूसरी तरफ महापौर का खुला विरोध—इस स्थिति ने निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जनता अब जानना चाहती है कि आखिर गेट रहेगा या रास्ता खुलेगा?
सुरक्षा का फैसला तथ्य और तकनीकी आकलन से होगा या राजनीतिक बयान से?
और सबसे अहम—
यदि सुरक्षा सबके लिए है तो व्यवस्था भी सबके लिए समान क्यों नहीं?
52 सीढ़ी का गेट अब एक लोहे का गेट भर नहीं रहा। यह नगर निगम की पारदर्शिता, समानता, प्रशासनिक अनुशासन और जवाबदेही का गेट बन चुका है। अब देखना होगा कि इसे जनता के लिए खोला जाता है या राजनीतिक टकराव के बीच बंद ही रखा जाता है।



