
अल्मोड़ा
उत्तराखंड की सबसे लंबी, उच्च हिमालयी क्षेत्र में आयोजित होने वाली धार्मिक एवं ऐतिहासिक नंदा राजजात यात्रा के आयोजन वर्ष को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। यह यात्रा प्रत्येक 12 वर्षों में आयोजित होने वाली एक पौराणिक परंपरा है, जिसमें मां नंदा को उनके ससुराल विदा करने की धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है। ऐतिहासिक रूप से इस यात्रा में कुमाऊं के चंद राजाओं और काँसुवा के कुंवारों की बराबर भागीदारी रही है, जो सदियों से चली आ रही परंपरा का प्रतीक है।
परंपरा के अनुसार नंदा राजजात यात्रा का आयोजन गढ़वाल मंडल के नौटी गांव तथा कुमाऊं मंडल के अल्मोड़ा से होता आया है। इस यात्रा का अत्यंत गहरा धार्मिक, सांस्कृतिक और पौराणिक महत्व है, जिससे उत्तराखंड के लाखों श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी हुई है। 12 वर्षों के चक्र के अनुसार इस बार नंदा राजजात यात्रा का आयोजन वर्ष 2026 में प्रस्तावित है।
हालांकि, नंदा राजजात समिति गढ़वाल द्वारा एकपक्षीय रूप से यात्रा को वर्ष 2027 में आयोजित करने का निर्णय लिया गया है, जिस पर कुमाऊं मंडल की नंदा राजजात समिति से कोई औपचारिक वार्ता नहीं की गई। इस निर्णय को कुमाऊं पक्ष ने परंपराओं के विपरीत और जनभावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बताया है।
कुमाऊं के चंद्र वंश के युवराज नरेंद्र चंद्र राज सिंह ने इस विषय पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा है कि हजारों वर्षों से चली आ रही इस पवित्र परंपरा के साथ किसी भी प्रकार का परिवर्तन उत्तराखंड की धार्मिक आस्था के साथ खिलवाड़ होगा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि नंदा राजजात यात्रा अपने निर्धारित समय, अर्थात 12 वर्षों के अंतराल पर ही आयोजित की जानी चाहिए। परंपरा में बदलाव न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत करेगा, बल्कि इसके पौराणिक इतिहास पर भी गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
युवराज नरेंद्र चंद्र राज सिंह ने कहा कि आदिकाल से यह परंपरा रही है कि कुमाऊं और गढ़वाल के राजाओं की दो राज छनतोलियां इस यात्रा का प्रतिनिधित्व करती रही हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष द्वारा एकतरफा निर्णय लेना उचित नहीं है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि इस विषय पर शीघ्र कोई सर्वसम्मत निर्णय नहीं लिया गया, तो कुमाऊं मंडल से आयोजित होने वाली नंदा राजजात यात्रा को वर्ष 2026 में ही जनभावनाओं का सम्मान करते हुए आयोजित किया जाएगा।
उन्होंने यह भी बताया कि इस संबंध में शीघ्र ही प्रदेश सरकार के साथ बैठक कर स्थिति को स्पष्ट किया जाएगा, ताकि सभी पक्षों की सहमति से समाधान निकाला जा सके। साथ ही उन्होंने नंदा देवी राजजात समिति, नौटी (गढ़वाल) से अनुरोध किया कि वह इस विषय पर पुनर्विचार कर सभी संबंधित समितियों और परंपरागत प्रतिनिधियों के साथ संवाद स्थापित करे।
कुमाऊं पक्ष का मानना है कि सर्वसम्मति से और परंपरा के अनुसार यात्रा का आयोजन वर्ष 2026 में ही किया जाना उत्तराखंड की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण के लिए आवश्यक है। लाखों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी इस यात्रा को लेकर लिया गया कोई भी निर्णय व्यापक सहमति और परंपराओं के अनुरूप होना चाहिए।


