
अल्मोड़ा/देहरादून।
उत्तराखण्ड डिप्लोमा इंजीनियर्स महासंघ की 27 सूत्रीय लम्बित मांगों के निराकरण को लेकर प्रदेशभर में आंदोलन की शुरुआत हो चुकी है। महासंघ ने शासन स्तर पर लंबे समय से समस्याओं के समाधान हेतु प्रयास करने के बावजूद कोई ठोस निर्णय न होने पर चरणबद्ध आंदोलन का ऐलान किया है।
महासंघ की ओर से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को संबोधित एक ज्ञापन जिलाधिकारी अल्मोड़ा के माध्यम से प्रेषित किया गया है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि यदि शीघ्र समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।
22 जनवरी की बैठक में हुआ निर्णय
दिनांक 22 जनवरी 2026 को महासंघ की उच्चाधिकार समिति की बैठक में विस्तार से चर्चा के उपरांत सर्वसम्मति से आंदोलन का निर्णय लिया गया। निर्णय के अनुसार 02 फरवरी 2026 से 23 फरवरी 2026 तक प्रथम चरण का आंदोलन चरणबद्ध तरीके से संचालित किया जा रहा है।
इसी क्रम में 18 फरवरी 2026 को प्रदेश के सभी जनपदों में डिप्लोमा इंजीनियर्स द्वारा एक दिवसीय धरना-प्रदर्शन किया गया। महासंघ के पदाधिकारियों के अनुसार यह केवल प्रथम चरण है। यदि शासन स्तर पर सकारात्मक पहल नहीं हुई तो द्वितीय चरण के आंदोलन की घोषणा भी शीघ्र की जाएगी।
23 फरवरी को देहरादून में रैली व सचिवालय घेराव
महासंघ ने घोषणा की है कि 23 फरवरी 2026 को प्रदेशभर के डिप्लोमा इंजीनियर्स देहरादून में एकत्रित होंगे। परेड ग्राउंड से रैली निकालते हुए उत्तराखण्ड सचिवालय तक मार्च किया जाएगा और सचिवालय का घेराव किया जाएगा।
महासंघ के नेताओं का कहना है कि यह आंदोलन पूरी तरह लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण रहेगा, किंतु यदि मांगों की अनदेखी जारी रही तो भविष्य में कार्य बहिष्कार अथवा व्यापक हड़ताल जैसे कठोर कदम भी उठाए जा सकते हैं।
शासन की हठधर्मिता से बढ़ा आक्रोश
ज्ञापन में कहा गया है कि महासंघ आंदोलन और हड़ताल का पक्षधर नहीं है, परंतु शासन स्तर पर मांगों को लम्बित रखने की नीति और आदेशों के क्रियान्वयन में विलंब के कारण कर्मचारियों में भारी आक्रोश व्याप्त है।
महासंघ ने यह भी उल्लेख किया कि 13 जून 2025 को आयोजित महासंघ के महाधिवेशन में मुख्यमंत्री स्वयं मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हुए थे और मांगों पर सहमति जताई थी। इसके बावजूद आज तक धरातल पर कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।
विकास कार्यों में अहम भूमिका
डिप्लोमा इंजीनियर्स राज्य के विकास कार्यों की रीढ़ माने जाते हैं। महासंघ का कहना है कि उसके सदस्य विषम भौगोलिक परिस्थितियों में कार्य करते हुए राज्य की महत्वपूर्ण परियोजनाओं को सफलतापूर्वक क्रियान्वित कर रहे हैं।
चारधाम यात्रा मार्गों को सुचारू रखना, आपदा राहत से संबंधित निर्माण कार्यों को समयबद्ध ढंग से पूरा करना, अर्द्धकुम्भ-2027 की व्यवस्थाओं में योगदान देना, तथा राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं जैसे जल जीवन मिशन और नमामि गंगे का क्रियान्वयन—इन सभी में डिप्लोमा इंजीनियर्स की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
महासंघ का दावा है कि इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के निर्वहन के बावजूद उनकी समस्याओं की अनदेखी किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
सामाजिक दायित्वों में भी सक्रिय
डिप्लोमा इंजीनियर्स महासंघ केवल विभागीय कार्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक सरोकारों में भी सक्रिय भूमिका निभाता है। महासंघ द्वारा प्रतिवर्ष प्रदेश स्तर पर रक्तदान शिविरों का आयोजन किया जाता है। आपदा के समय राहत कार्यों में भी सदस्य अग्रिम पंक्ति में रहते हैं।
प्रदेश हित में समाधान की मांग
महासंघ के जनपद सचिव इ० ललित मोहन बिष्ट और जनपद अध्यक्ष इ० जी० एस० महरा ने संयुक्त रूप से कहा कि प्रदेश हित में यह आवश्यक है कि शासन 27 सूत्रीय मांगों पर गंभीरता से विचार कर त्वरित निर्णय ले।
उन्होंने कहा कि यदि समय रहते सकारात्मक निर्णय नहीं हुआ तो कर्मचारियों में असंतोष और बढ़ेगा, जिससे विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
द्वितीय चरण की तैयारी
महासंघ के अनुसार 23 फरवरी को प्रस्तावित सचिवालय घेराव के पश्चात उच्चाधिकार समिति की पुनः बैठक होगी, जिसमें द्वितीय चरण के आंदोलन की रणनीति तय की जाएगी। इसमें कार्य बहिष्कार, सामूहिक अवकाश या अनिश्चितकालीन आंदोलन जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
सरकार से सकारात्मक पहल की अपेक्षा
महासंघ ने मुख्यमंत्री से विनम्र निवेदन किया है कि वे व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप कर 27 सूत्रीय मांगों के समाधान हेतु संबंधित विभागों को निर्देशित करें। उनका कहना है कि यदि मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक निर्णय लिया जाता है तो प्रदेश के समस्त डिप्लोमा इंजीनियर्स सरकार के आभारी रहेंगे और विकास कार्यों में पहले की तरह समर्पित भाव से योगदान देते रहेंगे।
प्रदेश में तेजी से बदलते विकास परिदृश्य के बीच डिप्लोमा इंजीनियर्स का यह आंदोलन शासन के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। अब सबकी निगाहें 23 फरवरी को होने वाले सचिवालय घेराव और उसके बाद शासन की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।

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