
अल्मोड़ा।
सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा को अस्तित्व में आए कई वर्ष बीत चुके हैं और वर्तमान कुलपति प्रो. सतपाल बिष्ट को कार्यभार संभाले लगभग ढाई वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। किंतु इस अवधि में विश्वविद्यालय के छात्र हित, शैक्षणिक गुणवत्ता और प्रशासनिक सुधार को लेकर कोई ठोस एवं उल्लेखनीय उपलब्धि सामने न आने के आरोपों ने अब गंभीर रूप ले लिया है। विभिन्न छात्र संगठनों और युवा नेताओं ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर उदासीनता, वित्तीय अनियमितताओं और पक्षपातपूर्ण कार्यशैली के आरोप लगाते हुए उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।
छात्र नेताओं का कहना है कि बीते ढाई वर्षों में दर्जनों ज्ञापन कुलपति कार्यालय को सौंपे गए, परंतु किसी भी ज्ञापन पर प्रभावी संज्ञान लेकर ठोस कार्रवाई नहीं की गई। उनका आरोप है कि कुलपति का विश्वविद्यालय में नियमित रूप से उपस्थित न रहना, निर्णय लेने में विलंब और कुछ विशेष लोगों के प्रभाव में रहकर कार्य करना विश्वविद्यालय की गरिमा और स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
कक्षाओं की अनियमितता और घटती छात्र संख्या
आरोप है कि विश्वविद्यालय एवं संबद्ध महाविद्यालयों में शिक्षकों द्वारा नियमित कक्षाएं नहीं ली जा रहीं, जिससे शैक्षणिक वातावरण प्रभावित हो रहा है। जिस विश्वविद्यालय को कभी “पठन-पाठन ” की शैक्षणिक संस्कृति के लिए जाना जाता था, वहां पिछले तीन वर्षों से प्रत्येक संकाय में छात्र संख्या में निरंतर गिरावट देखी जा रही है। छात्र नेताओं का कहना है कि यह स्थिति प्रशासनिक विफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
वित्तीय अनियमितताओं के आरोप
विश्वविद्यालय में वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप भी लगातार सामने आ रहे हैं। छात्र नेताओं का कहना है कि विकास एवं जीर्णोद्धार कार्यों के नाम पर लीपापोती कर लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। टेंडर प्रक्रिया के बजाय अपने चहेते लोगों से कार्य कराए जाने की चर्चाएं आम हैं। आरोप है कि जांचों को दबाया जा रहा है और दोषी पाए जाने के बावजूद जिम्मेदार व्यक्तियों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही।
छात्र संगठनों का कहना है कि विश्वविद्यालय एक प्रकार के “नेक्सस” या “सिंडिकेट” के माध्यम से संचालित हो रहा है, जहां पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव है।
कुलपति आवास प्रकरण
कुलपति आवास लंबे समय से बनकर तैयार होने के बावजूद संबंधित फर्म से हैंडओवर नहीं लिया गया है। आरोप है कि ठेकेदार द्वारा कुछ शर्तें न माने जाने के कारण जानबूझकर प्रक्रिया लंबित रखी गई है। इस कारण विश्वविद्यालय को प्रतिमाह हजारों रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार उठाना पड़ रहा है। छात्र नेताओं ने इसे संसाधनों के दुरुपयोग का उदाहरण बताया है।
अतिथि व्याख्याताओं और संविदा कर्मचारियों की स्थिति
विश्वविद्यालय में कार्यरत अतिथि व्याख्याताओं एवं संविदा कर्मचारियों की स्थिति भी चिंता का विषय बताई जा रही है। आरोप है कि प्रत्येक संकाय में अतिथि व्याख्याताओं के उत्पीड़न की शिकायतें सामने आई हैं। चार अतिथि व्याख्याताओं को शैक्षणिक कार्य के स्थान पर मल्टीपर्पज कार्यों में अटैच किए जाने का मामला भी उठाया गया है।
छात्र नेताओं का कहना है कि विश्वविद्यालय गठन के समय से कार्यरत संविदा कर्मचारियों एवं अतिथि व्याख्याताओं को नियमित किए जाने के बाद ही नई भर्तियां निकाली जानी चाहिए थीं। वर्तमान में जारी नियमित भर्ती विज्ञप्ति में आरक्षण संबंधी खामियों का आरोप भी लगाया गया है, जिससे वर्षों से कार्य कर रहे कर्मचारियों में निराशा व्याप्त है।
राजनीति शास्त्र और विधि संकाय में अनियमितता के आरोप
राजनीति शास्त्र विभाग में छात्रों के अंक बढ़ाने-घटाने और अतिथि व्याख्याताओं को प्रताड़ित करने का मामला जांच में सामने आने के बावजूद अनुशासनात्मक कार्रवाई न होने का आरोप लगाया गया है। इसी प्रकार विधि संकाय में दो-दो जांच समितियों की रिपोर्ट के बाद भी अनुशंसाएं लागू न किए जाने पर सवाल खड़े किए गए हैं।
छात्र नेताओं ने प्रश्न उठाया है कि आखिर दोषियों को संरक्षण किसके इशारे पर दिया जा रहा है। कई मामलों में छात्रों और कर्मचारियों को न्यायालय की शरण में जाने के लिए विवश होना पड़ा है, जिसकी जिम्मेदारी विश्वविद्यालय प्रशासन पर डाली गई है।
स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों में शुल्क और गुणवत्ता का मुद्दा
BBA, विधि, M.Com सहित अन्य स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों में छात्रों से हजारों रुपये शुल्क लिए जा रहे हैं। परंतु आरोप है कि शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षक संख्या और संसाधनों में समानता नहीं है। छात्र संगठनों ने “समान शुल्क – समान शिक्षा” नीति लागू करने की मांग की है।
उच्च न्यायालय के आदेशों की अनदेखी का आरोप
कुछ मामलों में उच्च न्यायालय के आदेशों का पालन न किए जाने का भी आरोप लगाया गया है। छात्र नेताओं ने इसे प्रशासनिक मनमानी करार देते हुए कहा कि यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
उच्च स्तरीय जांच की मांग
उपरोक्त सभी अनियमितताओं को देखते हुए छात्र संगठनों और युवा कांग्रेस से जुड़े नेताओं ने उत्तराखंड सरकार एवं महामहिम राज्यपाल से विश्वविद्यालय की समस्त प्रशासनिक, वित्तीय एवं शैक्षणिक कार्यप्रणाली की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय किसी व्यक्ति विशेष की जागीर नहीं, बल्कि हजारों छात्रों के भविष्य का प्रश्न है। यदि पारदर्शिता, समरूपता और विश्वास बहाल नहीं किया गया तो व्यापक छात्र आंदोलन किया जाएगा।
इस अवसर पर युवा नेता गोपाल भट्ट, पूर्व जिला एनएसयूआई प्रदीप बिष्ट, पूर्व छात्र संघ उप सचिव गौरव सिंह सतवाल, जिला अध्यक्ष प्रत्याशी युवा कांग्रेस विक्रम फर्त्याल, प्रदेश महासचिव युवा कांग्रेस कमल पाठक, छात्र नेता किरन आर्या, संतोष कुमार, ब्लॉक अध्यक्ष युवा कांग्रेस राजकमल, जिला महासचिव युवा कांग्रेस सुनील कुमार, पारस डसीला, शुभम टम्टा, सचिन बिष्ट सहित अनेक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
छात्र नेताओं ने एक स्वर में कहा कि वे छात्र हित, पारदर्शिता और न्याय के लिए संघर्ष जारी रखेंगे और विश्वविद्यालय प्रशासन में व्याप्त कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाते रहेंगे।






