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Khabar Satyvartaa > उत्तराखण्ड > अल्मोड़ा > राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी बदहाल उत्तराखंड का ग्रामीण सच
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राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी बदहाल उत्तराखंड का ग्रामीण सच

कपिल मल्होत्रा
Last updated: January 25, 2026 12:07 am
कपिल मल्होत्रा
4 weeks ago
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स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के अभाव ने बढ़ाया पलायन, सरकारी दावों पर उठे सवाल

अल्मोड़ा। उत्तराखंड राज्य की स्थापना 9 नवम्बर 2000 को पर्वतीय क्षेत्रों के सर्वांगीण विकास, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्थानीय रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी। राज्य गठन को 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन आज भी उत्तराखंड का ग्रामीण अंचल विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर खड़ा दिखाई देता है। पहाड़ों में बसे सैकड़ों गांव बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं और सरकार के विकास के दावे जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते।

ग्रामीण क्षेत्रों में हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि लोग रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की तलाश में अपने पैतृक गांव छोड़ने को मजबूर हैं। लगातार हो रहे पलायन ने पहाड़ों को वीरान कर दिया है। गांवों में अब अधिकतर महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे ही बचे हैं, जबकि युवा वर्ग रोज़गार के लिए शहरों और मैदानी क्षेत्रों का रुख कर चुका है।

उत्तराखंड पलायन आयोग की पहली रिपोर्ट वर्ष 2018 में सामने आई थी, जिसमें साफ तौर पर बताया गया था कि रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी पलायन के मुख्य कारण हैं। बावजूद इसके, रिपोर्ट सौंपे जाने के वर्षों बाद भी इन मूल समस्याओं के समाधान के लिए कोई ठोस नीति या प्रभावी कार्रवाई देखने को नहीं मिली। यह स्थिति राज्य की नीतियों और प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।

विकास के नाम पर केवल संसाधनों का दोहन

राज्य सरकारें विकास के नाम पर पहाड़ों में सड़कों, बांधों और अन्य परियोजनाओं का ढोल पीटती रही हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इस तथाकथित विकास से स्थानीय लोगों को अपेक्षित लाभ नहीं मिला। सड़कें जरूर गांवों तक पहुंची हैं, लेकिन ये सड़कें ग्रामीणों को शहरों की ओर ले जाने का जरिया बन गई हैं, न कि शहर की सुविधाओं को गांव तक पहुंचाने का माध्यम।

पर्यावरणविदों का मानना है कि अनियंत्रित निर्माण और पहाड़ों के अंधाधुंध दोहन के कारण प्राकृतिक आपदाओं में भी लगातार वृद्धि हो रही है। भूस्खलन, सड़क धंसना और बादल फटने जैसी घटनाएं अब आम हो चुकी हैं, जिनका सीधा असर ग्रामीण जीवन पर पड़ रहा है।

रोज़गार के अवसर न के बराबर

ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोज़गार के अवसर लगभग समाप्त हो चुके हैं। सरकार की ओर से जो योजनाएं लाई भी जाती हैं, वे या तो जटिल नियमों में उलझी होती हैं या फिर ज़मीनी जरूरतों से मेल नहीं खातीं। परिणामस्वरूप आम ग्रामीण इन योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाता।

रोज़गार के अभाव में पहाड़ों के युवा दसवीं-बारहवीं के बाद शहरों में होटल, ढाबों और असंगठित क्षेत्रों में काम करने को मजबूर हैं। इससे न केवल गांवों की सामाजिक संरचना प्रभावित हो रही है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था भी पूरी तरह चरमरा गई है।

शिक्षा व्यवस्था भी बदहाली की शिकार

उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की स्थिति भी चिंताजनक है। एक ओर स्कूलों में बच्चों की संख्या लगातार घट रही है, वहीं दूसरी ओर विद्यालयों को बंद किए जाने की प्रक्रिया तेज़ हो गई है। इससे शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों से जुड़े रोजगार भी खत्म हो रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारें इस मूल सवाल पर ध्यान नहीं दे रहीं कि आखिर पहाड़ी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम क्यों हो रही है। पलायन, संसाधनों की कमी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव इस समस्या की जड़ में है।

ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की भयावह तस्वीर

यदि उत्तराखंड के ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे की बात की जाए, तो स्थिति और भी दयनीय नजर आती है। कई गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या उपकेंद्र तक मौजूद नहीं हैं। जहां केंद्र हैं, वहां डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी है।

अल्मोड़ा जनपद में वर्ष 2016–17 के आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में कुल 42 एलोपैथिक चिकित्सालय/औषधालय हैं, जिनमें कुल 372 बेड और 74 डॉक्टर कार्यरत थे। इसके विपरीत शहरी क्षेत्र में 16 चिकित्सालयों में 340 बेड और 58 डॉक्टर उपलब्ध थे। पूरे जनपद में कुल मिलाकर प्रति एक लाख आबादी पर केवल 22 डॉक्टर उपलब्ध थे, जबकि राष्ट्रीय औसत 80 डॉक्टर प्रति लाख और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार 100 डॉक्टर प्रति लाख होने चाहिए।

रिक्त पद और विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी

ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में मौजूद सुविधाओं की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। 2024 की CAG रिपोर्ट के अनुसार राज्य में स्वीकृत 21,670 स्वास्थ्य पदों में से लगभग 41 प्रतिशत पद रिक्त हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी और भी गंभीर है, जिससे गंभीर बीमारियों का इलाज ग्रामीण क्षेत्रों में संभव ही नहीं हो पाता।

ग्रामीणों को छोटी-सी बीमारी के इलाज के लिए भी कई किलोमीटर दूर शहरों या घाटी के अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। परिवहन सुविधाओं की कमी और आर्थिक तंगी के कारण कई बार लोग समय पर इलाज नहीं करा पाते, जिससे मामूली बीमारियां भी जानलेवा साबित हो जाती हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से बढ़ता संकट

ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसव सेवाओं की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए दूर-दराज के अस्पतालों तक जाना पड़ता है। कई बार खराब सड़कें, वाहन की अनुपलब्धता और समय पर सहायता न मिलने से रास्ते में ही जटिलताएं उत्पन्न हो जाती हैं।

स्थानीय सामाजिक संगठनों का कहना है कि समय पर इलाज न मिलने के कारण कई परिवार अपने प्रियजनों को खो चुके हैं। यह हालात संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार पर भी सवाल खड़े करते हैं।

सरकार से ठोस नीति की मांग

विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि जब तक ग्रामीण स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक पलायन पर रोक लगाना संभव नहीं है। आवश्यकता है कि सरकार ग्रामीण क्षेत्रों के लिए व्यावहारिक और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप नीतियां बनाए, स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की नियुक्ति सुनिश्चित करे और युवाओं के लिए स्थानीय रोजगार के अवसर सृजित करे।

राज्य गठन के 25 वर्ष बाद अब यह अपेक्षा की जा रही है कि सरकार केवल विकास के दावे न करे, बल्कि पहाड़ों के गांवों तक वास्तविक विकास और मूलभूत सुविधाएं पहुंचाए, ताकि उत्तराखंड का ग्रामीण समाज फिर से जीवंत हो सके।

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